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Let's make life a pilgrimage together!

Let's make life a pilgrimage together!
Following the trail of colorful emotions and beautiful divine relationships. Now life Blossoms, beginning to love because it is a vibrant land of love and a beautiful feelings to wander across the heart during the journey of awakening. But here are some of the most stunning moments to witness life in full bloom with divine relationship and divine action like spring...And now thoughts are in bloom

One who never dies, understand and know that part before dying.

How can we stay healthy?

Wrong?
Anywhere, anything, when something is born,
 which was not needed - is born.
 Whatever it is, whether it is
 a word, whether it is a chaff, a germ or a worm, 
it means that if it is wrong, it will die.
 Like Cancer! Who was born idle in body?
This question is important -
 We cannot always leave it to luck or to God. 
Whatever is to be left to God, we have never given up.
The wrong always dies - not right.
In the same way, 
whatever happened in the wrong universe or in any creature,
 it is a sign that it will die.
So one day even death will die
When I had just arrived in Canada, my aunt got breast cancer. Treatment continued for 2 years, but aunt was not well. When I went to India and saw my aunt how she is suffering her wounds and how she is hurting with pain. I had to help my aunt - but aunt always replied, because she wanted to face her pain on her own, aunt did not like to have pity. It was very important to respect her thinking and respect her heart. I had love and a friendly relationship with my aunt.
One day, I asked my aunt to see me.
Aunt's breast was eaten by small insects. Small little white colored insects were eating aunt's breast. I looked at aunt while handling the slipping breath. An aunt was also seen, but she said that I have to get well soon, then I have to go to America with the children.
A person, whose body was eating insects, how much pain must that person's mind suffer? How would you see yourself dying every moment? There was a hope in the death of aunt that the children have to go to America.
Such moments, such occasions, such circumstances, such a condition, where there is only pain. Aunt used to look at any part of life, she could see nothing but pain. There was a small hope in the soul that the martyr God will heal and I will go to America.
And aunt died.
Hope to live in such pain,
 And this hope is far from me. My understanding does not go to this place.
The question now is that no one wants to do wrong nor does anyone want to do wrong with him?
 Then what is going on that is going wrong - who is doing this?
The chain of all wrongs begins with tension.
Stress: How does stress arise in us?
When any thought, thought, feeling, condition, situation, control our mind or heart, or mind.
What happens with stress?
Stress weakens our cells or say that stress drinks our blood.
Our body started to go wrong.
 Wrong is always fatal.
When 100 types of such stresses participate in the body, it becomes cancerous. Cancer is the result of 100 diseases.
I would not hesitate to say that we are all so wrong that our body is no longer a body of disease like a pile of dirt. All of you also wonder where does fly sit? On the dirt Where will such illness come?
When we start going wrong in any part of life, then understand that we are dying. What is wrong will always die.
This world is wrong, so it will die, which is born in it.
How do we live then?
 One who never dies, understand and know that part before dying.
The best and deepest medicine
 is to understand life first and then move forward.
 Because we will get real health only
 when our mind, mind and heart 
will also be healthy.

***—***


हम कैसे तंदरुस्त रह सकतें हैं ?
ग़लत ?
कहीं पर भी , कुछ भी, जब फालतू पैदा होता है, जिस की कोई ज़रूरत नहीं थी- पैदा हो गया।
  कुछ भी हो, चाहे लफ्ज़ हो, चाहे कोई घा-फूस हो, कोई जर्म हो या कीड़ा-मकोड़ा हो, 
 मतलब कि कुछ भी हो, गलत हो, वो मरेगा ही।
 जैसे कैंसर! जिस्म में फालतू पैदा हुआ, हुआ कैसे? 
यह सवाल ज़रूरी है -
 हम सदा ही किस्मत पर या खुदा पर नहीं छोड़ सकते।
 जो भी खुदा पर छोड़ना होता है ,वो  हम ने कभी छोड़ा नहीं। 
ग़लत सदा मरता ही है - सही नहीं। 
वैसे ही जो जो भी गलत ब्रह्मण्ड में हुआ या किसी भी जीव में भी हुआ, 
वो संकेत है कि मारेगा ही।
सो एक दिन मौत भी मरेगी ही 
जब मैं अभी कनाडा में आई ही थी, सो मेरी चाची  को ब्रैस्ट कैंसर हो गया।  २ साल इलाज़ चलता रहा, पर चाची ठीक ना हुई।  जब मैं  इंडिया गईऔर चाची को देखा कि वो कैसे अपने ज़ख़्म को झेल रही है और कैसे दर्द से कुरला रही है।  मैंने चाची की मदद करनी- पर चाची ने सदा जवाब दिया, क्योंकि वो अपने दर्द को आप ही झेलना चाहती थी,  चाची को तरस भरी निगाहें पसंद नहीं थी। उस की सोच को इज़ात देनी और दिल का मान रखना बहुत ज़रूरी था।  चाची के साथ मेरा प्यार और मेरा दोस्ताना रिश्ता था। 
एक दिन मैंने चाची को कहा कि मुझे ज़खम तो देखा दे। 
चाची की ब्रैस्ट छोटे छोटे कीड़े  ने खा ली थी।  छोटे छोटे सफेद रंग के कीड़े  चाची की ब्रैस्ट को खा रहे थे। मैंने  फिसलती  साँसों  संभाल कर चाची  देखा।  चाची एक बुत भी दिखाई दे रही थी पर उस ने कहा कि मैंने अब जल्दी ही तंदरुस्त हो जाना है, फिर मैं बच्चों के साथ अमेरिका चली जाना है। 
एक व्यक्ति, जिस के जिस्म को कीड़े खा रहे थे।उस इंसान का मन कितने दर्द को झेलता होगा? पल पल कैसे खुद को मरते देखता होगा ? चाची के मरने में भी एक आस जुडी हुई थी कि  बच्चों को ले के अमेरिका चली जाना है। 
ऐसे पल, ऐसे मौके, ऐसे हालात, ऐसी हालत , जिस में सिर्फ दर्द ही हो।  ज़िंदगी के किसी भी हिस्से की ओर चाची देखती थी, उस को दर्द के सिवा कुछ नहीं दिखाई देता था।  रूह में कहीं एक छोटी सी आस थी कि शयद गॉड ठीक कर देगा और मैं अमेरिका चली जाऊँगी। 
और चाची मर गई। 
इतने दर्द  में भी जीने की आस ,
 और यह आस ,मेरी समझ से बहुत दूर है। मेरी समझ इस जगह पर जाती ही नहीं। 
सवाल अब यह है कि कोई भी व्यक्ति ना ही गलत करना चाहता है और ना ही चाहता है कि उस के साथ कोई गलत करे ?
 फिर यह सब जो गलत हो रहा है यह सब क्या है - इस को कौन कर रहा है ?
तमाम गलत का सिलसिला शुरू होता है, तनाव से। 
तनाव: तनाव हमारे में कैसे पैदा होता है ?
जब कोई भी सोच, विचार, भावना, हालत, हालात, हमारे मन या दिल, या दिमाग़ पर कंट्रोल कर लें। 
तनाव के साथ होता क्या है ?
तनाव हमारे सेल्स को कमज़ोर करता है या कहो कि तनाव हमारा खून पीता है।
हमारे जिस्म में गलत होना शुरू हो गया। 
 गलत सदा ही जानलेवा होता है। 
जब १०० किस्म के ऐसे तनाव आदि जिस्म में भाग लेते हैं , तो कैंसर बन जाता है। कैंसर १०० बिमारी का नतीजा है। 
मैं कहने से संकोच नहीं करूंगी कि हम सब इतने गलत हैं कि हमारा जिस्म, जिस्म नहीं रहा एक गंदगी का ढेर की तरह बिमारी का ढ़ेर बना हुआ है। आप सब भी सोचो कि माखी कहाँ पर बैठती है ?  गन्दगी पर।  ऐसे ही बिमारी कहाँ पर आएगी ?
जब हम ज़िंदगी के किसी भी हिस्से में गलत होने लगतें हैं तो समझ लो कि मरने लगें हैं। गलत जो है, वो सदा मरेगा ही। 
यह संसार गलत है, सो मरेगा ही, जो इस में पैदा हुआ है। 
तब हम जीएं कैसे ?
 जो कभी मरता नहीं, मरने से पहले उस हिस्से को समझ लेना और जान लेना।  
सब से अच्छी और गहरी दवा यही है कि हम पहले ज़िंदगी को समझें, फिर आगे बढ़े।  
क्योंकि हम को असली तंदरुस्ती उस वक़्त ही मिलेगी, 
जब हमारा मन, दिमाग और दिल भी तंदरुस्त होगा 

   
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