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My Profession is to always find God in Nature

My Profession is to always find God in Nature
What I knew was that the silence blossomed the heart. When the heart blossomed, there was a feeling of love. The romance started with me. When my romantic-mind took all my stress from me all the time, I could not know. I who I am, I am unknown, today I remembered Buddha in unknown happiness

Wishing eternal life ( शाश्वत जीवन )

My deepest hunger and thirst remained only of eternal life and how I understood life from solid to liquid and how emptiness explained to me that laughter and wave are the same thing.

Sometimes I am so surprised at myself that I have such a hunger to get God, to know, to understand and to be absorbed! How does the memory of God erase me, how do I forget everything, and how am I losing even step by step? How is this journey, and how is it intended? At all times, I am struggling in a state of a strange spirit. No tiredness, no texture, just the way I look, it seems that there is a secret in every place, which will reveal itself to me.

When my gaze stops at someone, a wave of smile runs across my lips inadvertently. My ideology takes the form of wrinkles and becomes the decoration of my forehead. Then, by itself, a burst of laughter erupts like a waterfall from the deep and enters my nerve-system and makes me stand in front of the answer, increasing the speed of blood.
Have you ever seen the moment when a smile is born?
The unknown laughter that came, why did I come, from which I was also unaware, but came - I know, this is all? What is laughter
Ever thought about this?
When my eyes stopped at one place, I laughed - I don't know why - nothing ever happens due to no reason.
Light reaches first, voice comes later. Have you understood anything?
Reaction occurs first, understanding comes later.
 We awaken to the point of consciousness, which was related to that particle of the universe, both of which have a positive relationship, the reaction of that reconciliation is my laughter - like a wave of hot-cold air. The warm air, the mixing of cold air, created the wave. The sea is the body. Which has all the water and land. Likewise, laughter arose. In the same way, a feeling of personal feeling, with its real root, means a state of harmony with the universe. Only one of that feeling, one of that thought, one of that feeling, which was born in me, where is his real existence in the universe. With that I got an encounter with my thinking and feeling.
 The reconciliation of two clouds produces electricity and sound, in the same way, a collision of two things will produce something - this is Universe Law or say it is Hukam.
Hunger is very big and very deep. Life itself has hunger, food and digestion. Hungry means food.
This biography of me is just one episode of my thinking, which has no idea how many years to complete. So much is known that death will turn the page of my biography.

Living the depths from solid to air
Understanding emptiness from concrete to sky
 Knowing the feeling from solid to electricity
To pass from solid to lay energy.
 What should I do? My hunger is very big.
 Which one did I go from Punjab to Delhi? Or to go to France from California?
The journey from solid to solid is somewhat different.
Energy becomes solid, many ages pass, then it is formed. But we understood one thing, everything is easy. If we saw ourselves becoming liquid then we understood a secret and a quality of all energy.
To get a solid one has to be solid
To understand a liquid one has to be a liquid
 Energy has to become energy to live
how ?
Waves and laughter
 Can we all experience a similar identity in these two?
Flashing lightning and tornado
Can we consider these to be the same?
Today, I can see it, which has all these shapes and sizes. The very thread that tied all of us together. The thread that is neither light nor emotion.
Light and emotion
 When anyone ever saw you with much love, your body was a bit shocked, what is this shock?
And what is the relation of shock with gaze?
How did it look to be a shock, ever wondered?
Electric shock
Shocked by emotion
 Did the two make a difference?
When our beloved saw us
What else did he throw at us to see that we were shocked?
This was energy.

The energy level in our body was right and now the energy came towards us at a fast pace, then that incoming energy had to shock us.
Or think that the level of energy in our body was low, when I saw with love that the deficiency will be fulfilled, the body did not stand for a minute, it started to balance the energy, it came as a shock, our energy level was corrected.
The question now is that we see every day with eyes, so when seen with love, this energy we got means that love is an energy.
Anger is also an energy.
Now?
Electricity is also an energy
Waves are also an energy
Laughter is also an energy
Different forms of energy and different levels
To understand this energy level, I have to become energy.
Laughing
Like waves
Lightning
Like love
how ?
Be conscious
I have to become conscious.
How to become conscious
Do every karma carefully
If my exaltation is of eternal biography, then I will have to get this eternal biography before I die, because if my death also comes out of the eternal level, then my death also became eternal. For eternal life, every part of life has to be seen before eternal.
Then I became what I am, I became eternal. Now I understood, knew, accepted the dress of my 5 element body.

***———***

मेरी गहरी भूख और प्यास सिर्फ शाश्वत जीवन की ही रही और मैं कैसे ठोस से तरल होते जीवन को समझा और खालीपन ने कैसे मेरे को समझाया कि हंसी और लहर एक ही चीज़ है। 
मैं कभी कभी खुद पर इतनी हैरान होती हूँ कि मेरे को खुदा को पाने की, जानने की, समझने की और लीन हो जाने की कितनी भूख है ! खुदा की याद मेरे को कैसे अलोप कर देती है, कैसे मैं सब कुछ भूल जाती हूँ, और कैसे मैं कदम कदम पर हारी हुई भी जीत रही हूँ ? यह कैसे यात्रा है, और कैसा इस का मक़सद है ? हर वक़्त अजीबो -गरीब रूह की स्थिति में संघर्ष-रत रहती हूँ। कोई थकावट नहीं, कोई बनावट नहीं बस जिस तरफ भी नज़र घुमाती हूँ ऐसे लगता है कि हर जगह में एक राज़ है, जो खुद को मेरे आगे प्रगट कर देगा। 

जब मेरी नज़र किसी पर रूकती है तो अनजाने में ही होठों पर मुस्कान की लहर दौड़ जाती है। मेरी विचारधारा सिलवट का रूप ले के मेरे माथे का सिंगार बन जाती है। फिर खुद-ब- खुद गहरे में से झरने की तरह हंसी का फुब्बारा फूटता है और मेरे नर्व -सिस्टम में घुसता है और खून की गति को बढ़ाता हुआ ,मेरे को जवाब के आगे खड़ा कर देता है। 
क्या उस पल को कभी देखा है ,जब मुस्कान का जन्म ही होता है ?
यह जो अनजानी हंसी आई, क्यों आई ,जिस से मैं भी बे-खबर थी, पर आई -यह मैं जानती हूँ,? 
हंसी है क्या ?
कभी इस के बारे में सोचा क्या ?
जब मेरी नज़र एक जगह पर रुकी, तो हंसी आ गई -कारण नहीं पता - बिन कारण से कभी कुछ होता ही नहीं , तो ?
लाइट पहले पहुंच जाती है , आवाज़ बाद में आती है।  आई कुछ समझ ?
रिएक्शन पहले होता है, समझ बाद में आती है। 
 हमारा चेतन-रूप का वो बिंदु जाग गया, जिस का संबंध ब्रह्माण्ड के उस कण के साथ था, दोनों की पॉजिटिव रिश्तेदारी है, उस मिलाप का रिएक्शन मेरी वो हंसी है - जैसे गर्म-सर्द हवा के टकरा से लहर उठती है।  गर्म हवा, ठंडी हवा का मिलाप, जिस से लहर पैदा हुई। समुन्दर जिस्म है। जिस में पानी, ज़मीन सब है। वैसे ही हंसी पैदा हुई। वैसे ही व्यक्तिगत अहसास की सांझ, उस की असली जड़ के साथ।मतलब कि ब्रह्मण्ड के साथ एकभाव की अवस्था।  सिर्फ एक उस अहसास की, एक उस सोच की , एक उस भावना की, जो मेरे में पैदा हुई, उस का असली अस्तित्व ब्रह्मण्ड में कहाँ है।  उस के साथ  मेरी सोच और भावना का एनकाउंटर हो गया।
 दो बादलों का मिलाप बिजली और आवाज़ पैदा करता है, वैसे ही दो चीज़ों का टकरा कुछ तो पैदा करेगा ही -यह है यूनिवर्स लॉ या कहो कि यह है हुकम। 
भूख बहुत बड़ी और बहुत ही गहरी है। ज़िंदगी आपने आप में ही भूख भी है , खाना भी है और हाज़मा भी है। भूख लगी है मतलब कि food है। 
मेरी यह जीवनी मेरी सोच का सिर्फ एक एपिसोड है, जिस ने अभी पता नहीं कितने सालों तक पूरा होना है। इतना पता है कि मौत मेरी जीवनी के पेज को पलटेगा। 

ठोस से लेके हवा तक की गहराई को जीना
ठोस से ले के आसमान जैसे खालीपन को समझना 
 ठोस से ले के बिजली तक के अहसास को जानना 
ठोस से ले के ऊर्जा तक के रूप में समा जाना। 
 मैं क्या करूं मेरी भूख ही बहुत बड़ी है। 
 कौन सा मैंने पंजाब से दिल्ली जाना है? या कैलिफ़ोर्निया से फ्रांस जाना है ?
ठोस से ठोस तक की यात्रा का हिसाब-किताब  कुछ ओर है। 
ऊर्जा का ठोस बनना , बहुत युग बीत जातें हैं , तब बनता है।  पर हम को एक बात समझ में आ गई तो  सब आसान है।  अगर हम ने खुद को तरल होते देख लिया तो तमाम ऊर्जा का हम को एक राज़ और एक गुण समझ में आ गया। 
ठोस को पाने के लिए ठोस ही होना पड़ेगा 
तरल को समझने के लिए तरल ही होना पड़ेगा 
 ऊर्जा को जीने के लिए ऊर्जा ही बन जाना पड़ेगा 
कैसे ?
लहरें और हंसी 
 क्या हम सब इन दोनों में कोई एक सी पहचान अनुभव कर सकतें हैं ?
चमकती बिजली और बवंडर
क्या हम इन को एक ही मान सकतें हैं ?
आज मेरे में वो नज़र आ रही है, जिस के यह सब रूप-रंग आकार हैं। वो बारीक़ सा धागा  जिस ने हम सब को एक में बांधा हुआ है।  वो धागा जो न ही रौशनी है  और  ना ही भावना है। 
रौशनी और भावना 
 जब आप को कभी किसी ने भी बहुत प्यार से देखा तो आप के जिस्म को एक झटका सा लगा था , यह झटका क्या है 
और नज़र के साथ झटके का क्या संबंध है ?
यह देखना झटका कैसे बन गया , कभी सोचा ?
बिजली से लगा झटका 
भावना से भी लगा झटका  
 इन दोनों में कोई फर्क लगा ?
जब हमारे प्यारे ने हम को देखा 
वो देखने में उस ने हमारी और क्या फेंका कि हम को झटका लगा ?
यह ऊर्जा थी। 

हमारे जिस्म में  ऊर्जा का लेवल सही था और अब हमारी ओर ऊर्जा तेज़ गति से आई , तो उस आती ऊर्जा ने हमारे को झटका देना ही था।
या ऐसा सोचो कि हमारे जिस्म में ऊर्जा का लेवल कम् था , प्यार से देखा जब तो कमी पूरी होगी, जिस्म एक मिनट झेल नहीं स्का, वो ऊर्जा को बैलेंस करने लगा तो झटका सा आया,  हमारी ऊर्जा का लेवल  सही हो गया 
सवाल अब यह है कि आँखों से तो हम रोज़ देखतें हैं, तो जब प्यार से देखा तो यह ऊर्जा हम को मिली मतलब कि प्यार एक एनर्जी है। 
क्रोध भी एक एनर्जी है। 
अब?
बिजली भी एक एनर्जी है 
लहरें भी एक एनर्जी है 
हंसी भी एक एनर्जी है 
एनर्जी के अलग अलग रूप और अलग अलग लेवल 
इस ऊर्जा- लेवल को समझने केलिए मुझ को ऊर्जा ही बन जाना पड़ेगा। 
हंसी जैसी 
लहरें जैसी
बिजली जैसी 
प्यार जैसी 
कैसे ?
होश में रहना
मुझ को होश ही बन जाना पड़ेगा। 
होश कैसे बनू ?
ध्यान रख कर हर कर्मा को ध्यान से करना  
अगर मेरी उमंग शाश्वत जीवनी की है तो मुझे मरने से पहले ही अपनी इस शाश्वत जीवनी को मिलना पड़ेगा, क्योंकि अगर मेरा मरना भी शाशवत लेवल में से ही निकल कर जाएगा तो मेरा मरना भी शाशवत हो गया। शास्वत जीवन के लिए ज़िंदगी के हर  हिस्से  को शास्वत से ही पहले देखना पड़ेगा। 
तब मैं जो मैं हूँ , मैं शास्वत मैं हो गई। अब  मैंने अपने ५ एलिमेंट जिस्म की पोशाक को समझ लिया, जान लिया, मान लिया।   
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