जब मैं अपनी रोज़ की सोच और भावना से मिलती हूँ और कैसे मेरी ज़िंदगी कला बनती है , वो सब को फिर मैं लफ़्ज़ों की पोशाक पहना देती हूँ। सो मैं आपने अनमोल तोहफा आप सब को भेंट कर देती हूं
जब मैं अपनी रोज़ की सोच और भावना से मिलती हूँ और कैसे मेरी ज़िंदगी कला बनती है , वो सब को फिर मैं लफ़्ज़ों की पोशाक पहना देती हूँ। सो मैं आपने अनमोल तोहफा आप सब को भेंट कर देती हूं
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