Have to walk like a Sanyaasi - No Matter what the Path

The beauty of life is very tasty - Question 3

Today we will talk about our third question.
Question is:
If you get a chance to fulfill your dream, do you have all those qualities that are needed to succeed?
Whatever we want or dream we have, it is in our existence, it is very good proof that we can fulfill our dream.
Now I talk, I want to I have always wanted to take the world into a hug, to love, I only have a relationship with everyone that I love everyone.
Now I have to think that how much I am conscious of my wish, how much I am ascendant, what is the way of fulfilling this wish in me, what is the way? I will not talk about quality here, I have given the answer to that. A person is as one wishes. We have always heard that 
'Fruit like the seed'
Condition and situation always present each other. Exactly this wish, Aim or Goal presents the person. Whether you wish or purpose: a person gets a lot of recognition from this.
I have wanted this since childhood. The path is long, because the wish is too big.
Anything long and anything big; Both are the same thing. If I want the sky, then how much time do I need to go to the sky? Just like: time + space + speed is the same thing - similarly long and big is the same.
 It is not that I have to marry or I want to earn money and buy a good house. If the wish is like the sky, then the path will be too long to reach the sky.
The question here is, am I going skyward in my daily life or not?
If I am going, I am still successful today.
If every day my step is going towards success, then my step is successful. If today the little move is being successful, so when it reached the destination, it was a complete success.
If my step is to be happy for me everyday then it means that I am on the right path.
Our positive behavior is a sign of our being right.
 Our hopes are our wings and our trust becomes life in those wings. 
When our foot falls somewhere in the path, then there is no perception of wrong in our heart, our behavior also works positive for the slipping condition. Our success is never negative for us. Or say that if our behavior is positive then it means that
 the destination also waits.
Second, we will always see that everyday ancients  are deepening our understanding and feeling. Which means that in life, it gives us all the education that we need.
 What does destination mean?
Like I want that all the world is mine and I have to hug everyone.
What's in the destination? What does destination mean to me?
I have to be able to hug everyone.
Now how do I qualify, who will decide this?
That is what I want - it exists.
Wish is not of the mind, but of my existence.
 Whatever our Wish or Aim is, it is part of existence.
 Our desire is part of the mind.
Our existence always fulfills the purpose and our mind always fulfills our desire.
Life is completely wise and beautiful. When we leave everything on life, when we see life how it is living, we will not get any more miraculous secrets than this.
Life looks at how the habit is - how is the our nature - what action is to be taken first - which path to follow - because at the same time we also have to complete the account of all our new and old deeds. We will not get any better accountant than life.
 If our life is a sensible accountant, what is its balance sheet? On which life writes the flow of our actions? ( Karma)
We all know the balance sheet of life. The balance sheet of life is named Time.
Whom do we call time - also know? What is the definition of time? How was the time born? What do you call time in the spiritual realm? The beauty of life is very tasty.
(* NOTE - These questions will be answered in upcoming episodes)
Life has to move forward according to the progress and process of the person.
Like I want to hug the whole world. How will I do it? What is my feeling? Which one should be my style, which one should be my behavior, which one should be my action, which enhances my whole personality! I do not know this as much as my consciousness knows.
My passion is my representativeway.
 My life is making me capable of the world or say that my consciousness is making me capable or say that God is making me. Whatever they say is correct. If I find it appropriate to say that I have qualified myself for this position, then it is also fine. This sentence will also reveal our personality.
We get an opportunity, because we deserve it. We are falling because our mind begins to enter. As understanding grows, we become closer to our destination. Our wish is the proof of our success that we were capable of this opportunity and we will succeed.

आज हम बात करेंगे हमारे तीसरे सवाल की। 
सवाल है :
अगर आप को आप के सपने को पूरा करने का मौक़ा मिल जाए,क्या आप में वो सब  गुण मजूद हैं, जो सफल होने के लिए चाहिए ?
जो भी हमारी चाहना होती है या हमारा सपना होता है, वो हमारे वजूद में है, यह सबूत ही बहुत उत्तम है कि हम अपने सपने को पूरा कर सकतें हैं। 
अब मैं बात करती हूँ, अपनी चाहना की। सदा से ही मेरी चाहना रही है कि मैंने संसार को जफ़्फ़ी पानी है, प्यार करना है, मेरा सब के साथ सिर्फ यही सम्बन्ध है कि मेरे को सब से प्यार है। 
अब मैंने यह सोचना है कि मेरी इस चाहना के लिए मैं कितनी होशमंद हूँ, मेरे में कितनी लग्न है, मेरे पास इस चाहना को पूरा करना का  सामान क्या है, राह क्या है? यहाँ पर गुण की बात नहीं करूंगी, उस का जवाब मैंने पहलों ही दे  दिया है। जैसी चाहना होती है, वैसा ही व्यक्ति होता है। हम ने सदा सुना है कि 'जैसी नीत वैसी मुराद ' 
हालत और हालात  सदा एक दूसरे को पेश करतें हैं।  बिलकुल ऐसे ही चाहना व्यक्ति को पेश करती है। चाहना हो या गोल : इस से व्यक्ति की बहुत पहचान हो जाती है। 
मेरी यह चाहना बचपन से है। रास्ता लम्बा है, क्योंकि चाहना बहुत बड़ी है।  किसी भी चीज़ का लम्बा होना और किसी भी चीज़ का बड़ा होना ; दोनों एक ही बात है। अगर मेरी चाहना आसमान की है तो मेरे को आसमान तक जाने  केलिए कितना वक़्त चाहिए ? जैसे टाइम+स्पेस+ स्पीड एक ही चीज़ है - वैसे ही  लम्बा और बड़ा एक ही है।  ऐसे नहीं है कि मैंने शादी करनी है यह चाहना थी या मैंने पैसा कमाना है और अच्छा घर खरीदना है।  अगर चाहना आसमान जैसी है तो रास्ता भी तो आसमान तक पहूँचने के लिए लम्बा ही होगा। 
सवाल यहाँ पर यह है कि  क्या मैं अपनी रोज़ाना की ज़िंदगी में आसमान की ओर जा रही हूँ कि नहीं ?
अगर जा रही हूँ, तो मैं आज भी सफल हूँ। 
अगर मेरा हर कदम मंज़िल की तरफ सफलता पूर्बिक जा रहा है  तो मेरा कदम सफल हुआ। आज कदम सफल हो रहा है तो जब मंज़िल पर पहूँच गई तो पूर्ण सफलता मिल गई। 
अगर हर रोज़ मेरी चाहना, मेरे लिए ख़ुशी ही बनती है तो मतलब यह है कि मैं सही राह पर ही हूँ। 
हमारा सकारत्मिक व्य्वहार  ही हमारे सही होने की निशानी होता है।  हमारी उमंग हमारे पंख होतें हैं  और हमारा भरोसा उन पंखों में जान बने होतें हैं। जब रास्तें में कहीं पर हमारा पाव  फिसलता है , तो हमारे दिल में गलत की धारणा  नहीं आती, फिसली हालत के लिए भी हमारा व्य्वहार पॉज़िटिव ही काम करता है। हमारी सफलता ही हम को कभी नेगेटिव नहीं।  या ऐसे कहो कि अगर हमारा व्य्वहार पॉज़िटिव रहा तो इस का यही मतलब है कि   मंज़िल भी इंतज़ार करती है। 
दूसरा हम सदा यह देखेंगे कि  हर रोज़ की घटनाएं हमारी समझ और भावना को गहरा करती जा रही है। जिस का मतलब यही है कि ज़िंदगी रास्तें में हम को वो सब शिक्षा देती है जो हम को होनी चाहिए। 
 मंज़िल का मतलब क्या है ?
जैसे मेरी चाहना है कि  सब संसार मेरा है और  मैंने सब को hug करनी है। 
मंज़िल इस में क्या है ? मंज़िल का मतलब मेरे लिए क्या है ?
मैंने इस काबिल होना है कि मैं सब को hug कर सकूं। 
अब मैं काबिल कैसे होती हूँ, यह फैंसला कौन करेगा ?
जो मेरी चाहना है -यह है वजूद की। 
चाहना मन की नहीं, मेरे वजूद की है।  हमारा कोई भी मक़सद हो या aim होता है, यह वजूद का हिस्सा होता है। हमारी desire  मन का हिस्सा होती है। 
हमारा वजूद सदा मकसद को पूरा करता है और हमारा मन सदा हमारी डिजायर पूरी करता है। 
ज़िंदगी पूरी wise  और पूरी सूंदर है। जब हम ज़िंदगी पर ही सब छोड़ देतें हैं तो ज़िंदगी को जब हम भी देखतें हैं कि यह कैसे जी रही है, इस से बड़ा चमत्कारी रहस्या ओर कहीं भी हम को नहीं मिलेगा। 
ज़िंदगी देखती है कि आदत कैसी है - सुभाव कैसा है - कौन सा एक्शन पहले करना है- कौन से मार्ग पर  चलना है -क्योंकि साथ ही साथ हमारे सब नये और पुराने कर्मों के बही-खाते को भी पूरा करना है। ज़िंदगी से अच्छा अकउंटेंट हम को कहीं नहीं मिलेगा। 
 अगर हमारी ज़िंदगी एक समझदार अकाउंटेंट है तो इसकी बैलेंस शीट कौन सी है ? जिस पर ज़िंदगी हमारे कर्मों के प्रवाह को लिखती है ?
हम ज़िंदगी की बैलेंस शीट को सब जानतें हैं। ज़िंदगी की बैलेंस शीट का नाम टाइम है। 
हम टाइम किस को कहतें हैं - पता भी है ? टाइम की परिभाषा की है ? टाइम पैदा कैसे हुआ ?
 आधियात्मिक-क्षेर्ता में  वक़्त को क्या कहतें हैं ? ज़िंदगी का सुभाव बहुत ही मज़ेदार है।
( *NOTE - इन सवालों का जवाब आने वाले एपिसोड में होगा )
ज़िंदगी ने व्यक्ति की प्रविर्ती और प्रकिर्या के अनुसार ही आगे कदम ले के जाना है। 
जैसे मेरी चाहना है कि मैंने सब संसार को hug करनी है। कैसे करूंगी? मेरा सुभाव क्या है? कौन सा मेरा स्टाइल होना चाहिए, कौन सा मेरा व्य्वहार होना चाहिए,   मेरा ऐसा कौन सा एक्शन होना चाहिए, जिस से मेरा पूरा व्यक्तित्व निखर कर आये ! यह मेरे को नहीं पता जितना मेरी चेतना को पता है। 
मेरी उमंग ही मेरे को पेश कर रही है । 
 मेरी ज़िंदगी मेरे को संसार के काबिल  बना रही है या कहो कि मेरी चेतना मेरे को काबिल बना रही है या फिर कहो कि ख़ुदा बना रहा है। जो भी कहेंगे वो ही सही है। अगर मेरे को कहना यह उचित लगा कि मैंने अपने आप को इस पोजीशन के काबिल बनाया ,तो यह भी ठीक है। यह सेंटेंस भी हमारी पर्सनालिटी को प्रगट करेगा। 
हम को मौक़ा मिलता ही, क्योंकि हम उस के क़ाबिल होतें हैं। हम गिरते इस लिए हैं कि हमारे मन की दाख़िलाअन्दाज़ी होनी शुरू हो जाती है।  जैसे  समझ बढ़ती जाती है, वैसे ही हम अपनी मंज़िल के नज़दीक होते जातें हैं।  हमारी चाहना ही हमारी कामयाबी का सबूत है कि हम इस मौक़े के काबिल थे और हम क़ामयाब  होंगे ही। 

Are we aware of our best understanding? Question 2

Now my second question was, how concerned are we all about our own good sense?
There is no talk of good nature nor good qualities here. We have to talk now that we understand that which we know ourselves very well. Till today, there should be some of us who have never seen this understanding carefully till today. I will give you some hints here, if no one has ever thought that - one will think and by realizing his/her real wisdom, will salute his own wisdom today.
 My question is, 'Are you aware of your best understanding?
That understanding never caught your attention. But you have never been separated from that understanding. You never even told anyone. Must be shy to tell the reason for social hesitation.
Now let me introduce you to one such delicate understanding of mine.
From childhood to the age of 38, I always had a description of 'how did this happen', 'Oh I didn't do it', 'God does everything for me'.
Nobody ever understood me. It is also true that I never did anything, everything was done. I have always seen how everything used to happen.
All those who lived around me always used to say, "I have done this - I am doing this, - I have earned this, - now I have to do this." 'And if I spoke this word even in my heart, or to look or test myself, then I could not bear it. I came to know better than one thing that my path is only God-confident. (only faith in God, not even myself)
It is understood that my trust in God is very deep. I do not trust me, only trust in God, deeper than myself. I have not seen God nor yet know whether there is such a thing as God or not, but on my faith, the next step could not be seen and understood. What was that?
If I trust God, why is it? Which such incident have I seen that I have such deep confidence in God? No such question came in my mind. The only thing in my mind and brain is, 'God does what I do'. No one had seen the incident so much that God could be trusted.
 What happened then?
Why did I have such confidence?
Was I born with this belief?
 Was this my way to trust?
What was it that I do not understand?
Which such understanding was hidden behind my misunderstanding, who wanted to introduce me to myself by becoming a question?
This is called searching for thinking means thinking about thinking. It is very important for the person.
Now when I say that God does everything to me, what is my understanding behind this, which I do not know till date?
Since childhood, I have seen that whenever there was to be an accident with me, who would stop it somehow. Stopping every time, it became a question for me that the accident stopped on occasion. Like someone has to push me from the roof - when someone raises his hand, then some stone comes on his hand and the accident is averted. Like we are in a dream. Someone comes to kill, stabs the sword, the eye opens before it is hit, something like that always happened to me. Now the next question was why this happened? Why did this happen?
I noticed that there is a deep point in my understanding, which has a dedicated spirit. In me, the understanding is deeper than all - that is devoted spirit.
How was it identified?
Like: My mother used to beat us a lot. Used to beat us with shoes, hand and stick. I saw that when I was beaten by my mother, there was a moment that I would become a witness of myself. And I did not know the pain again.I started to like watching this event, meaning that whatever happens, the event happens to me - just become the watchers. One day I had a thought that this world seems like a dream. Like I'm just dreaming. My life started seeing a miracle. An unseen power was realized behind this miracle. The feeling of that power only got deeper day by day. 
The deeper I got, the deeper a feeling in me that
 'everything is happening - no one is doing. '
Then I started thinking deeply.
 Even the breath comes, I do not take
Even think, I don't think
There is also a feeling,
 Everything is found as soon as the relationship is found.
I just completed 50% of my life when I was 10 years old. My daily life had made me a like idiot. I was not even interested in reading or writing. The school was a waste. It was also tempting for me to visit the religious places. Loved the Pir-Fakirs. So whoever is saint, I love them.
Trust in the unseen power increased by the day, so one day I was very emotional for unknown power. That day I prayed,
O unknown power, you are a very amazing thing, so today I dedicate everything to you. Whether it gives happiness or sadness, whether it gives life or death, your will. Just took care of one thing that everyone, whoever appears to me - loves them all - I am in love with everything, and you fell in love with me '.
 This was my first prayer of dedication. Which has more completed 50% of my life. So I got free in me. After that, my dedication has only been tested, which is still happening today.
My deepest understanding is this dedicated spirit, when I was 38 years old, my attention went to it. Then I wrote the book, whose name was 'Beyond Silence', there are 638 questions and answers in it.
This sense of mine has always been thoughtful for me and I was thought of for this at the age of 38. Dedicated spirit proved to be my best understanding.
And this understanding always made my life better and gave me a healthy life. Keep the body, mind, heart and soul always new and fresh.
There is an understanding among all of you, which will always keep your life new and fresh. If you are not alert for that then today you have to ask yourself a question.
How can I understand life deeper than most?
What is that to me that gives me more understanding of life?
It can be anything.
Any relationship, ant word, any pathway, may be any religion, any human being, anything that is visible to us, gives understanding, anything. Then you have to search about it within yourself.
Whatever is our deepest understanding, it is the way of our life that makes us successful.


अब मेरा दूसरा सवाल था कि हम सब अपनी खुद की अच्छी समझदारी के बारे में कितना सुचेत हैं ?
यहाँ पर न ही अच्छे सुभाव की बात हो रही है और ना ही अपने अच्छे गुणों की। हम ने बात करनी है अब अपनी उस समझ की, जो हम को खुद को बहुत अच्छी तरह पता है।  शयद आज तक हम से कुछ ऐसे हों ,जिन्होंने आज तक अपनी इस समझदारी को कभी ध्यान से देखा न हो। मैं यहाँ पर कुछ हिंट दूँगी, अगर किसी ने कभी ऐसा न सोचा होगा -वो सोचेगा और अपनी इस असली समझदारी को समझ कर, आज अपनी खुद की समझदारी को सलाम करेगा।
 मेरा सवाल यह है कि ,' क्या हम अपनी उत्तम समझ  के बारे में सुचेत हैं ?
वो समझदारी, कभी आप का ध्यान नहीं गया।  पर आप कभी उस समझदारी से अलग भी नहीं हुए। शयद आप ने कभी किसी को बताया भी नहीं। समाजिक झिझक के कारण  बताने में शरमाते होंगे।
अब मैं आप सब को, मेरी अपनी ऐसी ही एक नाज़ुक समझदारी से मिलवाती हूँ।
बचपन से ले के 38 साल की आयु तक मेरा सदा ही यह विवरण रहा कि 'यह कैसे हो गया', 'ओह मैंने तो यह किया ही नहीं', ' मेरा तो सब कुछ खुदा ही करता है,' .
किसी को भी मेरी कभी समझ नहीं आई। यह भी सच है कि मैंने कभी कुछ किया ही नहीं, सब हो जाता था।  मैंने सदा देखा ही है कि कैसे सब कुछ होता जाता था। 
मेरे आस-पास, जो भी सब रहने वाले थे, वो सदा यही कहते थे कि, 'मैंने यह किया- मैं यह कर रहा हूँ, - मैंने यह कमाया ,-अब मैंने यह करना है। ' और अगर मैंने अपने दिल में भी यह लफ्ज़ बोलना ,या खुद को देखने या परखने केलिए बोलना, तो मेरे से सहन नहीं होता था। मैं एक बात से अच्छी तरफ जान गई कि मेरा रास्ता सिर्फ खुदा-भरोसे वाला ही है।
यह तो समझ में आ गया कि  मेरा भरोसा खुदा पर बहुत गहरा है।  मेरा मेरे पर भरोसा नहीं, सिर्फ खुदा पर भरोसा है,  खुद से भी गहरा। मैंने खुदा को देखा नहीं और ना ही अभी तक पता है कि खुदा जैसी कोई चीज़ है भी है कि नहीं, पर मेरा भरोसा  पर इस से अगला कदम फिर न देख और समझ सकी।  वोह क्या था ?
अगर मेरा भरोसा खुदा है, क्यों है ? ऐसी कौन सी घटना मैंने देख ली है कि मेरे को खुदा पर इतना गहरा भरोसा हुआ है? ऐसा कोई भी सवाल मेरे दमाग में आया ही नहीं। मेरे मन और दमाग में सिर्फ यही कि, ' मेरे जो करता है खुदा करता है '. घटना भी कोई नहीं देखी थी कि खुदा पर इतना भरोसा हो जाए। 
 फिर हुआ क्या ? 
मेरे को ऐसा भरोसा क्यों हुआ ?
क्या मैं इस भरोसे के साथ ही पैदा हुई थी?
 क्या यह भरोसा करना ही मेरी राह थी? 
क्या था ऐसा, जिस की मुझे समझ नहीं आ रही है ?
यह मेरी न-समझी के पीछे ऐसी कौन सी समझ छुप्पी हुई थी, जो सवाल बन कर मेरे को अपने आप से मिलवाना चाहती थी?
इस को कहतें हैं सोच को खोजना मतलब कि सोच को विचारना। यह व्यक्ति के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। 
अब जब मैं कहती हूँ कि मेरा सब कुछ खुदा ही करता है तो इस कि पीछे मेरी ऐसी कौन सी समझ है, जिस का मेरे को ही आज तक पता नहीं ?
मैंने बचपन से ही देखा कि जब भी मेरे साथ कोई भी हादसा होना होता था, तो वोह किसे न किसी तरह रुक जाता है। हर बार रुकना, मेरे में सवाल बनता गया कि मौक़े पर हादसा रुक जाता है।  जैसे किसी ने मेरे को छत पर से धकेलना होता है -जब वो हाथ उठाता ही है तो हाथ पर आ के कोई न कोई पत्थर बजता है और हादसा टल जाता है। जैसे हम सपने में होतें हैं। कोई मारने को आता है , तलवार का वार करता है, वार होने से पहले ही आँख खुल जाती है , वैसे ही कुछ ,मेरे साथ सदा हुआ।  अब अगला सवाल यह था कि यह हुआ क्यों? ऐसे क्यों होता था ?
मैंने देखा कि मेरी समझ में एक गहरा बिंदु ऐसा है, जिस में समर्पित-भाव है। मेरे में जो समझदारी सब से गहरी है - वो है समर्पित-भाव। 
इस की पहचान कैसे आई ?
जैसे: मेरी माँ हम को बहुत मारती थी।  जुत्ती से,  हांथों से  और सोटी से हम को मारती थी। मैंने देखा कि माँ से जब मार पड़ती थी , तो एक पल ऐसा आता कि मैं ही अपने आप की गवाह बन जाती थी  और मेरे को फिर दर्द का पता नहीं चलता था।घटना को ऐसे देखना मेरे को अच्छा लगने लगा, मतलब कि कुछ भी हो चाहे घटना मेरे साथ ही हो - बस देखने वाले ही बन जाओ।  ऐसे ही एक दिन मेरे में एक ख्याल आया कि ऐसे तो यह संसार सपना ही लगता है। जैसे मैं बस सपना ही देख रही हूँ।  मेरे को ज़िंदगी एक चमत्कार दिखाई देने लगा।  इस चमत्कार के पीछे एक अनदेखी शक्ति का एहसास हुआ।  उस शक्ति का एहसास दिन-ब-दिन  गहरा ही होता गया।  जितना गहरा होता गया, उतना ही मेरे में एक भाव भी गहरा होता गया कि 'सब कुछ हो रहा है- कोई कर नहीं रहा। '
फिर मैंने गहरा सोचना शुरू किया। 
 सांसें भी आती हैं, मैं लेती नहीं 
सोच भी आती है, मैं सोचती नहीं 
भावना भी आती है,
 जैसे रिश्ते मिलते हैं, वैसे ही सब मिलता है। 
बस मेरी ज़िंदगी का ५० % हिस्सा मैंने पूरा कर लिया, जब मैं १० साल की थी।  मेरी हर रोज़ की ज़िंदगी ने, मेरे को कमली बना दिया था।  मेरी कोई भी रुचि लिखने पढ़ने में भी नहीं थी। स्कूल एक फालतू की  थी।  मेरे लिए धार्मिक जगहों पर माथा टेकना भी फज़ूल था।  पीर-फकीरों से बहुत प्यार था। सो कोई भी ऋषिमुनि हो मेरे को उन से प्यार है। 
अनदेखी शक्ति पर भरोसा दिनों दिन बढ़ता गया, सो एक दिन मैं अज्ञात-शक्ति  के लिए बहुत ही भावात्मिक-भाव से भरी हुई थी।  उस दिन मैंने प्रार्थना की, कि
हे अज्ञात शक्ति, तू ते बहुत ही कमाल की चीज़ है , सो आज मेरा सब कुछ तेरे ही समर्पित।  चाहे ख़ुशी दे या गमी, चाहे जीवन दे या मौत, तेरी मर्ज़ी।  बस एक बात का ख्याल रखीं कि मेरे को सब ,जो भी दिखाई देता है -उस का प्यार आता है - मैंने उन के साथ प्यार  हूँ, और तू मेरे साथ प्यार करीं' . 

यह मेरा समर्पति-भाव की पहली प्रार्थना थी।  जिस ने मेरा ५०% और जीवन पूरा कर दिया  . सो मैं आपने आप में आज़ाद हुई। उस के बाद  मेरा इस समर्पति-भाव का सिर्फ टेस्ट ही हुआ है, जो आज भी  हो रहा है। 
मेरी सब से गहरी समझदारी यह समर्पित-भाव है, जब मैं 38 साल की थी, तब मेरा ध्यान इस की ओर गया था।  फिर मैंने किताब लिखी थी, जिस का नाम था, 'चुप के पार', 638  सवाल-जवाब हैं उस में। 
मेरा यह समझदारी सदा मेरे लिए सुचेत रही और मैं इस के लिए सुचेत हुये 38 वें साल की आयु में। समर्पित-भावना मेरी सब से अच्छी समझदारी ,मेरे लिए साबित हुई।   
और इस समझदारी ने सदा मेरे जीने को अच्छा किया और मेरे को तंदरुस्त जीवन दिया।  जिस्म, मन, दिल और रूह को सदा नया और ताज़ा रखा। 
ऐसी ही आप सब में एक समझदारी है , जो आप के जीने को सदा नया और ताज़ा रखती होगी।  अगर आप उस के लिए सुचेत नहीं तो आज आपने आप को एक सवाल करना। 
मैं ज़िंदगी को कैसे सब से ज़्यादा गहरा समझ सकती हूँ ?
मेरे लिए वो कौन सी चीज़ है, जो मेरे को ज़िंदगी की ज़्यादा समझ देता है ?
वो कुछ भी हो सकता है। 
कोई रिश्ता, कोई लफ्ज़, कोई राह, कोई धर्म, कोई इंसान, कोई भी चीज़, जो हम को दिखाई देती है, समझ देती है, कुछ भी। उस के बारे में फिर अपने ही भीतर खोज करनी। 
जो हमारी सब से गहरी समझ होती है, वोही हमारी ज़िंदगी की वो राह होती है, जो हम को कामयाब  करती है । 

Do we all know why we did not succeed? Question 1

I gave 20 questions to all of you as well as myself. 
Today I am sharing the answer
to the first question with you all.
1 - Do we all know why we did not succeed?
The answer to this question is mine.
I am looking deeply into myself where I have failed and in which field I wanted to be successful.
When I see the depth of life as well as the depth of existence, I again ask myself the question, 'Jinder, are you really unsuccessful and do you think that there is 100% failure in life?
As long as there is a question before the question, the journey of the question is not complete. If the journey of question is complete then we will get our answer 100% correct.
My question has now given me the question that see yourself and life.
No one is a complete failure in life. If I say that those who commit suicide, they are unsuccessful, not even that, because they had the way to go out of their environment today. How it turned out is not important - it turns out it is important. The courage to kill oneself, the courage to separate themselves from their families is a great thing. For example:
I fell down a well. This well was at some place that there are few travelers on the move. I have fallen, and there is no way for me to get out, what should I do?
There is no unknown place - there are unknown situations and unknown situations too. There is only one way out. When any person walks on the road of death, he leaves life after thinking a lot.
We all have always complained that no one in the world?
Why didn't you?
Have we ever been someone?
Are we not in the world?
Are we giving this statement about our self?
When we make a complaint about anything, we forget that we are also one of them.
The one who commits suicide is not failed. Meaning that according to my experience nothing in the world is unsuccessful. The condition and stage of suicide is very painful, when a person takes this step, we know the art of freeing ourselves from guilt and adopt that art. Then we declare the person who committed suicide guilty.
I saw that everyone is successful in the world. Just like there is a world, we are all successful there. Losing is not a failure, standing at a lost place and looking deep, we get time.
The eternal colors of life are shapes and we will be able to see them according to our understanding. Life is such that it takes color as we would like to see.
We feel that our eye sees the thing, no, our understanding  sees the thing. Losing one or two in one place gives pain, that same pain will become more happiness.
If I do not find anyone successful in the world, then I can never consider myself a failure, this is the simple answer. But still I have not been able to fulfill one of my desires, is it not a failure?
This is not a failure, because I am walking on the path right now. Along the way, I am getting to experience which of my weaknesses have been removed now. The deeper the desire is to say or say that the larger the aim is, the longer and deeper the path is.

The heart will definitely get the destination today, but the patience is also infinite in the heart, who has come to recognize that this is a series of life like ages - so complete the path patiently and comfortably. Life is taking every moment forward and every moment, every thought, every step fails at once. My failure is only going to progress.
So my lack of understanding is my only delay. When the understanding is complete, I will be successful.


मैंने आप सब को भी और खुद को भी 20 सवाल दिए थे।
आज पहले सवाल का जवाब आप सब के साथ सांझा कर रही हूँ।
1 - क्या हम सब जानते हैं कि हम सफल क्यों नहीं हुए ?
इस सवाल का जवाब मेरा यह है।
बहुत गहरे से खुद में देख रही हूँ कि मैं असफल कहाँ से हूँ और मैं सफल किस खेत्र में होना चाहती थी।
जब ज़िंदगी की गहराई के साथ साथ, वजूद की गहराई को भी देखती हूँ ,तो खुद को फिर सवाल पर सवाल करती हूँ कि ' जिन्दर तू सच में ही असफल हैं और तेरे को लगता है कि ज़िंदगी में कोई १००%असफल होता है ?
सवाल के आगे जब तक सवाल है , तब तक सवाल की यात्रा भी पूरी नहीं हुई।  सवाल की यात्रा पूरी होगी तो हम को हमारा जवाब १००% सही मिलेगा ही।
मेरे सवाल ने अब मेरे को यह सवाल दिया है कि देख तू खुद को और ज़िंदगी को।
ज़िंदगी में कोई भी पूरी तरह असफल नहीं है।  अगर मैं यह कहूँ कि जो आत्महत्या करतें हैं , वो असफल हैं, वो भी नहीं , क्योंकि उन के पास वो राह तो थी कि वो अपने आज के माहौल से बाहर तो निकल गए।  कैसे निकले यह महत्वपूर्ण नहीं- वो निकले यह महत्वपूर्ण है।  खुद को मार देने की हिम्मत, खुद को अपने घरपरिवार से अलग कर देने का हौंसला बहुत बड़ी बात है।  उदाहरण के तौर पर :
मैं एक कुँए गिर पड़ी।  यह कुँए किसी ऐसी जगह पर था कि आते जाते मुसाफ़िर भी कम हैं।  मैं गिरी पड़ी हूँ, और मेरे बाहर निकलने की कोई आस ही नहीं , तो मैं क्या करूँ ?
अनजानी जगह ही नहीं होती- अनजाने हालात और अनजानी हालत भी होती है।  वहां से एक ही रास्ता बचता है।  जब कोई भी व्यक्ति मौत की ड़गर पर चलता है तो बहुत कुछ सोच समझ के ही ज़िंदगी को छोड़ता है।
हम सब ने सदा शिकायत की है कि संसार में कोई अपना नहीं ?
क्यों ?
क्यों नहीं आपने ?
क्या हम कभी किसी के बने हैं?
क्या हम संसार में नहीं है?
क्या यह स्टेटमेंट कहीं हम अपने खुद के बारे में तो नहीं दे रहे ?
जब हम किसी भी चीज़ के प्रति शिक़वा  प्रगट करतें हैं, हम भूल जातें हैं कि हम भी उन में से एक हैं।
आत्महत्या करन वाला भी असफ़ल नहीं। मतलब कि मेरे अनुभव के अनुसार संसार में कुछ भी असफल नहीं। आत्महत्या की स्थिति और अवस्था बहुत गहरी दर्दभरी होती है, जब कोई इंसान यह कदम लेता है तो हम खुद को दोष से मुक्त करने की कला को अच्छी तरह जानतें हैं और उस कला को अपनातें हैं। फिर हम आत्महत्या करने वाले को ही दोषी घोषित कर देतें हैं।
मैंने देखा कि संसार में सब सफल ही हैं।जैसा संसार है, वहां पर  हम सब सफ़ल हैं। हार जाना असफलता नहीं, हारी हुई जगह पर ही खड़े हो के ओर गहरे देखने का, हम को वक़्त मिलता है।
ज़िंदगी के अन्नत रंग रूप आकार हैं और हम उन को अपनी समझ के अनुसार ही देख पाएंगे। ज़िंदगी ऐसी है कि जैसी हम देखनी चाहेंगे, वैसा ही रंग रूप ले लेती है।
हम को लगता है कि हमारी आँख चीज़ को देखती है, नहीं, हमारी समझ चीज़ को देखती है। एक जगह पर एक या दो हारना जैसे दर्द देता है, वोही दर्द वैसे ही ज़्यादा सुख बनेगा।
अगर मेरे को संसार में कोई सफल लगता ही नहीं, तो मैं खुद को असफल कभी मान नहीं सकती, यह सीधा सा जवाब है।  पर फिर भी मैं अपनी एक चाहना को, अभी तक पूरा नहीं कर पाई, क्या यह असफलता नहीं ?
यह असफलता नहीं , क्योंकि अभी मैं राह पर चल रही हूँ।  राह साथ साथ ही अनुभव करवा रही है कि अब मेरी कौन सी कमज़ोरी दूर हुई है। जितनी गहरी चाहना होती है या कहो कि जितना बड़ा मक़सद होता है , उतना ही रास्ता लम्बा और गहरा होता है। 
 दिल तो करेगा ही कि आज ही मंज़िल मिल जाए, पर दिल में सब्र भी अनंत है ,जिस को यह पहचान आ चुक्की है कि यह ज़िंदगी का सिलसिला युगों जैसा है - सो रास्ते को सब्र और आराम से पूरा कर।  ज़िंदगी हर पल आगे ले के जा रही है और हर पल को ,हर सोच को, हर कदम को एक बार तो फेल करती ही है। मेरा फेल होना ही आगे बढ़ना बनता जा रहा है। 
सो मेरा लेट होना मेरी ही समझदारी की कमी है। जब समझ पूरी हो जायेगी, मैं सफल हो जाऊँगी। 

Our spirit

Our Spirit 

It’s in our spirit that we have meaning and purpose in life. At the deepest level our spirit gives us meaning and purpose and our spirit enables us to love one another, our self and God. It’s through our spirit that we have communion and fellowship with God. 

Our spirit gives us intuition between right and wrong. Our spiritual health will have a significant impact on our emotional health which will have a major influence on our physical health. 

The inter-connection between the spirit, the soul and the body is certainly a complex connection, nevertheless, the connection is very real.

Who I truly am is a being of light

We can recognize, 
Who I truly am is a being of light.” 
When we know this, 
we don’t get caught up in all the obstacles we encounter. 
Not because we are avoiding them 
or denying them or pushing them away, 
but because those obstacles actually
Who I truly am is a being of light
 don’t exist for beings of light. 
For a being of light, 
what you are right this very moment is all you have. 
It is in the presence of this moment, 
and only in the presence of this moment, 
that we can be where we are,
 that we can be ourselves, 
that we can be real. I
t is as simple as that.


Because every goodness made me conscious of my vice
 and every vice directed me towards goodness. 
Every part of the universe is lent a special zest by human’s own reflectiveness
 and life is rendered beautiful by human’s thoughtlessness.

 Gaze up and see the wonder and glory of the NATURE
Because the thoughtlessness is a beautiful stage of emptiness, 

which is infinite life space and endless like time. 

Then whatever be the secret of life as a whole,

 that experience makes the individual complete, 
perfect, and liberated.
 It s special taste enables us to cross the bounds of 
Time and Space.

A deep cave of emptiness: death & Life

Planting conscious thorns and planting flowers in unconsciousness: 
no difference between the two
Even the absence of silence in the ears was such that the whole universe went into the muted system.
Like the heartbeat ceased to be cast.
Just like today silence revolted with silence
Only anonymity was a question in my eyes.
 The silence of the trees was deeper than my silence. A strange sight coming from far away from the sky, which peeks at me from the middle of the trees, another eye looking at me from the right side, in which there is a very deep sense of life, the amazing beauty in which death and life The realization of the question was sending a wave of its own to me.
Such a wonderful and such a matchless environment, in which there was nothing else without the realization of God.
On the one hand, I speak my tongue and on the one hand my existence is giving only a testimony in the deep sense of silence. A deeply impatient gaze coming from the trees makes me stand before both death and life.
Death says: Why do I have to live?
Life says: Do you want me to live?
Same question for both.
I want to live, death or life
 What do I think and believe in death?
What do I understand and believe in life?
Before these two, what do I think myself and what do I believe?
What am I ?
A deep cave of emptiness
 What do you think about life?
A unique dream with open eyes
What do you think about death?
Beyond relaxation, rest and restless.
Now have you gone to death or to life?
 There is no difference.
 Life and death both looked different but not different. So there is no difference.
Today, when I was standing in this environment, the questions that were for me - the answer to them was becoming my testimony, then after a long time, I thought that, when will all this questioning process end?
Life is very sensible in you. It takes action only after seeing the thirst and hunger of the person. I see why the root of my existence was so deep. A lot of time has passed. This method had to deepen the root. Life is a wonderful thing in you. The more we go into the depths of this - the more it becomes our recreational tool.
This world is a game of death, not life. There are only a few players who play in the field of life. We cannot become players of life until we know death. Today, I stand before death and life only because I had to live full and full. She wanted to embrace life completely. Without the understanding of death, life cannot blossom.

Today, looking at death and life, we only remember our thirst. If there was no thirst, it would not have happened. My thirst was so deep that I could not even hug aeriana (daughter), if there was any other thought in me. Whoever I wanted to meet, I wanted to meet you wholeheartedly. I had a very deep allergic from incompleteness.
Today, face to face death and life is a very unique experience. Chup has attacked Chup. The silence of the tongue is a statement from the eyes. The silence of eyes is characterized by emptiness. The emptiness expresses itself silently.
Amidst the silence, the silence of silence is so deep that in this blissful state what is death, what is life, nothing.
 So the silent gaze of my silent existence, bowing with silence, welcomes death and life.


होश में कांटे लगाने और बेहोशी में फूल लगाने:
 दोनों में कोई फ़र्क़ नहीं 
कानों में चुप की भी ग़ैर-हाज़री ऐसी थी कि जैसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड म्यूट सिस्टम में चला गया। 
दिल की धड़कन ऐसी कि जैसे ceased कर डाली। 
जैसे आज चुप ने चुप के साथ ही  बगावत कर डाली। 
मेरी आँखों में सिर्फ गुमनामी ही सवाल बन कर खड़ी थी। 
 पेड़ों का सन्नाटा, मेरी चुप्पी से गहरा था। आसमान से भी दूर से आती एक निराली नज़र, जो पेड़ों के बीच में से झांकती मेरी ओर , मेरी राइट साइड में से देखती एक ओर आँख, जिस में बहुत ही गहरी झलकती ज़िंदगी की समझदारी, सब से अमेजिंग वो सुंदरता जिस में मौत और ज़िंदगी का अहसास सवाल बन कर मेरे तक अपने आप की तरंग भेज रहा था।
इतना लाज़वाब और इतना बेमिशाल  वातावरण, जिस में खुदा के अहसास के बिना ओर कुछ भी नहीं था। 
एक तरफ तो मेरी ज़ुबान वर्तालाप करती है और एक ओर तरफ में मेरा वजूद खामोशी की गहरी गर्दिश में सिर्फ एक गवाही दे रहा है। पेड़ों में से आती गहरी लरज़ती हुई नज़र, मेरे को मौत और ज़िंदगी दोनों के आगे खड़ा करती है। 
मौत कहती है : क्यों मेरे को जीना है ?
ज़िंदगी कहती है : क्या तू मेरे को जीना है ?
दोनों  का एक ही सवाल। 
मैंने जीना है, मौत को या ज़िंदगी को 
 मैं मौत को क्या समझती हूँ और क्या मानती हूँ ?
मैं ज़िंदगी को क्या समझती हूँ और क्या मानती हूँ ?
इन दोनों से पहले मैं खुद को क्या समझती हूँ और क्या मानती हूँ ? 
मैं क्या हूँ ?
खालीपन की एक गहरी गुफा 
 ज़िंदगी को क्या समझती हो ?
खुली आँखों का एक अनूठा सपना 
मौत को क्या समझती हो ?
विश्राम, आराम और बे-आरामी के पार। 
फिर अब तुम ने मौत की तरफ जाना है या ज़िंदगी की तरफ ?
 कोई भी फ़र्क़ नहीं। 
 ज़िंदगी और मौत,  यह दोनों अलग दिखाई देते थे पर अलग नहीं है।  सो कोई भी फ़र्क़ नहीं। 
आज जब  मैं इस माहौल में खड़ी थी, जो मेरे लिए सवाल थे- उन का जवाब मेरी ही गवाही बन रहा था, तो आज लंबे अरसे बाद ख़्याल आया कि, यह सब सवाल जवाब का सिलसिला कब ख़त्म होगा 
ज़िंदगी आपने आप में बहुत ही समझदार है। यह व्यक्ति की प्यास और भूख देख कर ही कदम लेती है। मैं देखती हूँ कि मेरे वजूद की जड़ इतनी गहरी क्यों थी। बहुत आरसा बीत गया। इस आरसे ने जड़ को गहरा करना ही था। ज़िंदगी आपने आप में बहुत ही कमाल की चीज़ है। जितनी हम इस की गहराई में जाएंगे -उतना ही यह हमारा मनोरजनिक साधन बन जाती है। 
मौत का खेल है यह संसार , ज़िंदगी का नहीं। ज़िंदगी के मैदान में खेलने वाले थोड़े से ही खिलाड़ी हैं। ज़िंदगी के खिलाड़ी हम बन ही नहीं सकते,जब तक हम मौत को जान नहीं लेते। आज मौत और ज़िंदगी के आगे, इस लिए ही खड़ी हूँ कि मैंने भरपूर और सम्पुर्ण जीना था। ज़िंदगी को पूरा आलिंगन करना चाहती थी।  मौत की समझ के बिना ज़िंदगी को झप्पी पा नहीं सकते। 

आज मौत और ज़िंदगी की तरफ देख कर ,सिर्फ अपनी प्यास ही याद आती है। अगर प्यास न होती तो यह मुकाम न होता। मेरी प्यास इतनी गहरी थी कि मैं aeriana ( बेटी ) को भी झप्पी नहीं पाती थी, अगर मेरे में कोई ओर सोच ही होती थी।  जिस किसी को भी मैं मिलना चाहती, मैं आपने पूरे दिल से ही मिलना चाहती।मेरे को अधूरेपन से बहुत गहरी allergie  थी। 
आज मौत और ज़िंदगी के आमने-सहमने खड़ना बहुत ही अनूठा अनुभव है।  चुप ने ही चुप पर हमला किया हुआ है।  ज़ुबान की खामोशी, नज़रों से बयान होती है।  नज़रों की ख़ामोशी, खालीपन से ब्यान होती है।  खालीपन अपना इज़हार फिर ख़ामोशी से करता है। 
खामोशी के बीच खामोशी की झप्पी इतनी गहरी है कि इस आनंदमई अवस्था में मौत क्या,  ज़िंदगी क्या, कुछ भी नहीं। 
 सो मेरे  ख़ामोश वजूद की ख़ामोश नज़र, ख़ामोशी से सर झुका करके मौत और ज़िंदगी का स्वागत करती है  

रेतली राह का मुसाफ़िर

रेतली राह का मुसाफ़िर
माननीय प्यार , आज मैं खुद को आप के आगे सन्मानित करना चाहती हूँ कि मैं आप की रचना हूँ ; और खुदा के आगे मैं खुद को धन्यवाद का उपहार देना चाहती हूँ कि 'धन्यवाद शहीर ' कि आप ने खुदा से प्यार किया। हर किर्या के लिए धन्यवाद
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