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Have to walk like a Sanyaasi - No Matter what the Path

Monastic dimensions- part one


 It is just as if nature has given itself a work contract. That is to meet me with every particle and see what my reaction is and the effect on me?
Like, there is a rapture in every moment that he thinks of making his existence like that. So the moment also thought of becoming a companion of nature.
Whichever way I look, it seems that every gust of the universe wants to visit me only.
There is a strange atmosphere on every side, in which it seems that the eyes of everything are looking towards me. And I am standing in such a spotlight that I cannot hide myself anywhere. I look deeply into you as if no one can see that I have started seeing myself. I have a wonderful distinction towards me, like I am trying to talk to someone else, not me.
 Without speaking, the art of speaking my words is coming from me, so when I lifted my eyes and saw who was giving this learning to me, I saw that a leaf falling from a tree in front of me was traveling towards the ground is. Seeing that falling leaf, the style of the tree, I had to learn how to express my feeling without speaking.
 I saw from afar that a tree whose leaves were wearing yellow color was taking off from the world, but a new branch was growing in its root. As soon as I started making a video of the tree, then in this 30 minutes, the tree stated its feeling.
 The tree said: -

Whenever life gives something, it also takes something at that time. Today some of my leaves are decorated in yellow color because they have time to go and some new leaves are coming because they are the time of arrival. If you want to look at life only with a blank eye, then all the reality will be seen and when we come to know the truth and falsehood, then we are beyond it. ''
 Today I am going through the monk dimension. Everything is speaking the words of retirement. So I asked a tree dressed in monk colors
What is Sanyaas?
 Is retirement really needed?
What is real renunciation?
Is the sannyasin recognized the truth of life?
At that time, with a light breeze, a thicket dusted the dry leaves hanging on the tree. A sound began to be heard in the sound of leaves shrub from the tree.
I remembered the song 'Gurdas Maan'.
"Peeed tere jaan ki kiddah jarga main”
(If you are gone, how will I end the pain of your departure)
 The sound of the moving wind made every leaf a pattern, listening to which my silence turned into a trance. I was looking at a very big tree, which was quite old, and when I looked carefully at every branch of it, a very big branch was broken, which was still stuck with it.
When I saw the broken branch, moisture started floating in my eyes. Why? Then my eyes began to fall on every part of the tree, just as I am watching the tree carefully, the tree continues to share its feeling with me.
 The tree was old and very large. With the tree itself not being lifted, a branch of the tree confessed to breaking itself to make the tree simple and comfortable.
After stopping the steps, I saw the tree and I gestured to the tree, then why is this branch stuck now? Is the burden still on you?
The tree said: -
Twig showed love to me, now it remains with me till it is completely gone.
Now this monastic dimension of nature answers me,
What is Sanyaas?
Sanyaas:
Leaf break is not Sanyaas, leaf loss is Sanyaas.
Just as a leaf falls from a tree, 
similarly when a person falls from the material dimension.
 Means bored.
The person does not need to retire, but life. Life is a big circle, which is also an exhibition in you, which goes through everything and every season. All the colors of life are visible to you, because you have passed through them.
Sannyas is a level that will come on every living being. The only thing worth remembering is that every part has infinite forms, colors as well as sizes.
like :

A person leaves home, leaves the tree in the same way. Sannyas is not a negative step, it is a part of life that you have to be depressed with the worldly dimension sometimes. Sadness means that you have come to know from every part of your life. There is nothing for you to do, so now you are not interested in the things of the world. Now your life wants to go to the next step.
Will you complete a class in school 5 times? will not do. How many times will you keep repeating 2 times 2 = 4?
So we will all become monks, but in what form it will be based on our own unique beauty.
What is real renunciation?
True and real renunciation starts when only one hunger or say thirst works in us, that now I have to be absorbed in the real form. A person whose mind has worn a monk's color, who has understood the understanding of life, who does not even have the desire of God, just looks at himself with passion and looks at the universe patiently is. Such a person is a complete monk.
And it is also absolutely true that whatever our form may be, when we are bored with worldly life, there will be sadness in us. To overcome the sadness, we will look at someone upwards. We can also call this upper level God, we can also say the highest level of life, and we can also say soul.
Today there are sanyasi waves in every leaf of the tree, which captivates my soul and makes me learn the renunciation of life. This is the conversation that is happening among us without our words, I see how the atmosphere around me is silent and listening to it. Because the waves will never end and these waves will increase their own aura.
I asked the tree what is the mind of a monk?

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बस ऐसे ही लगता है कि कुदरत ने खुद को ही एक काम का ठेक्का  दे दिया है।  वो है कि हर कण से मेरी मुलाकात करवानी और यह देखना कि मेरा रिएक्शन क्या होता है और मेरे पर असर क्या होता है ?
जैसे आज हर पल में उतावलापन है कि वो आपने वजूद को भी जैसे युग बना देने की सोचता है। तो पल ने भी कुदरत का साथी बन जाने की सोच ले ली। 
जिस तरफ भी मेरी नज़र पड़ती है, ऐसे लगता है कि ब्रह्माण्ड का हर झोँका, मेरे से मुलाकात करके ही जाने की चाहत रखता है। 
हर तरफ़ एक अजीब सा माहौल है, जिस में ऐसे लगता है कि हर चीज़ की आँखें मेरी ओर  ही देख रही है।   और मैं, एक ऐसे spotlight  में खड़ी हूँ कि मैं खुद को कहीं छुपा भी नहीं सकती।  मैं आपने ही गहरे में ऐसे झांकती हूँ कि जैसे किसी की नज़र न पड़ जाए कि मैं अब खुद को ही देखने लगी हूँ।  मेरा मेरे प्रति ही सलूक एक अद्भुत भेदभरा है, जैसे मैं मेरे से नहीं, किसी ओर से बात करने की कोशिश कर रही हूँ। 
 बिन बोले ही अपनी बात को बोलने की कलाकारी, मेरे में कहा से आ रही है तो जब मैंने आँख उठा कर देखा कि यह सीख मेरे को कौन दे रहा है तो मैंने देखा कि मेरे आगे एक पेड़ से गिरता पत्ता ज़मीन की ओर  यात्रा कर रहा है।  उस गिरते पत्ते को देखते, पेड़ का अंदाज़, मेरे को यह सीख दे गया कि बिन बोले ही अपनी भावना को कैसे प्रगट करना है। 
 मैंने दूर से देखा कि उस एक पेड़ को जिस के पत्ते  पीले रंग को पहन कर  संसार से विदा ले रहे थे, पर उस की जड़ में ही नई  टहनी अंकुर हो रही थी। जैसे ही मैंने पेड़ की वीडियो बनाने लेगी तो इस ३० मिनट्स में ही पेड़ ने अपनी भावना को ब्यान किया। 
 पेड़ ने कहा:-
ज़िंदगी जब भी कुछ देती है तो उस वक़्त कुछ लेती भी है।  आज मेरे कुछ पत्ते  पीले  रंग  में सज गए हैं क्योंकि उन का जाने का वक़्त है और कुछ नए पत्ते आ रहें हैं क्योंकि उन का आने का वक़्त है। ज़िंदगी की ओर  सिर्फ कोरी आँख से ही देखना है तो सब असलियत दिखाई देगी और जब हम सच और झूठ को जान लेते हैं तो हम उस के पार हो जातें हैं।''
 

आज मैं  सन्यासी आयाम  में से गुज़र रही हूँ। हर चीज़ संन्यास की  बोली ही बोल रही है।  तो मैंने सन्यासी रंग में सजे एक पेड़ से पुछा कि 
संन्यास है क्या ?
 क्या सच में ही संन्यास की ज़रुरत होती है? 
असली सन्यास क्या होता है ?
क्या सन्यासी हो के ही ज़िंदगी के सत्य को पहचाना जाता है ?
उसे वक़्त हवा के एक हलके से झौंके ने आ के पेड़ पर लटके सुक्के पत्तों को झाड़ा।  पेड़ से झाड़ रहे पत्तों की आवाज़ में एक तर्ज़ सुनाई देने लगी। 
मेरे को 'गुरदास मान ' के गीत की याद आई। 
'' पीड़ तेरे जान की किदह जरगा मैं ''
 चलती हवा की छो ने  हर पत्ते  को सुर दे के तर्ज़ बना दिया ,जिस को सुन कर मेरी ख़ामोशी मदहोशी में बदल गई। मेरी नज़र बहुत बड़े पेड़ पर थी, जो कि काफी बूढ़ा  हो चूका था, और मैंने गौर से उस की हर टहनी को देखा तो एक बहुत बड़ी टहनी टूटी हुई थी, जो अभी भी उस के साथ ही अटकी हुई थी। 
मैंने जब टूटी हुई टहनी को देखा ,तो मेरी आँखों में नमी  तैरने लगी।  क्यों ? तब  मेरी नज़र पेड़ के हर हिस्से पर पड़ने लगी तो, जैसे जैसे मैंने पेड़ को गौर से देखती जा रही हूँ, वैसे ही पेड़ अपनी भावना को मेरे साथ सांझा करता जा रहा है। 
 पेड़ बूढ़ा  था और  बहुत बड़ा था।  पेड़ से खुद का बोझ ही उठाया नहीं जा रहा तो पेड़ की एक टहनी ने पेड़ को सरल और सहज करने के लिए खुद को टूट जाना ही कबूल किया। 
मेरे चलते कदमों रुक कर पेड़ को देखा और मैंने  इशारे से ही पेड़ से पुछा तो फिर यह टहनी अब अटका क्यों  है ? बोझ तो अभी भी आप पर है ?
पेड़ ने कहा :-
मेरे को टहनी ने प्यार दिखा दिया , अब जब तक  यह पूर्ण रूप से ज़िंदगी से चली नहीं जाती, तब तक यह मेरे ही पास रहे।
अब कुदरत का यह सन्यासी आयाम, मेरे को जवाब देता है कि संन्यास है क्या ?
संन्यास :

पत्ते का टूटना संन्यास नहीं,  पत्ते का झड़ जाना संन्यास होता है। 
जैसे पेड़ से पत्ता झड़ता है, वैसे ही जब व्यक्ति  पदार्थी-आयाम से झड़ता है।  मतलब ऊबता है।  
संन्यास की ज़रूरत व्यक्ति को नहीं, ज़िंदगी को होती है।  ज़िंदगी एक बहुत बड़ा घेरा है , जो आपने आप में एक प्रकीर्ति भी है, जो हर चीज़ में से और हर सीजन में से गुज़र कर जाती ही है। ज़िंदगी के जितने भी रंग आप को दिखाई देते हैं, वो इस लिए कि आप उन में से गुज़र चुक्के हो। 
सन्यास एक लेवल है, जो हर  जीव पर आएगा ही।  बात सिर्फ यह याद रखने के योग्य है कि हर हिस्से के अनंत रूप भी होतें हैं, रंग भी और आकार भी। 
जैसे :
त्यागी व्यक्ति घरबार छोड़ता है , वैसे ही पत्ता पेड़ को छोड़ता है। सन्यास नकारात्मिक कदम नहीं है , यह ज़िंदगी का हिस्सा है कि आप ने कभी कभी सांसारिक आयाम से उदास होना ही है।  उदासी मतलब कि आप आपनई ज़िंदगी के हर हिस्से से जानू हो गए।  वहां पर आप के करने को कुछ नहीं है, सो अब आप को संसार चीज़ों में दिलचस्पी नहीं है।  अब आप की ज़िंदगी अगले कदम पर जाना चाहती है। 
क्या आप स्कूल में एक क्लास को ५ बार  पूरी करोगे ? नहीं करेंगे।  कितनी बार २ टाइम्स २=४  को दुहराते रहोंगे ?
सो हम सब सन्यासी बनेगे ही।
असली सन्यास क्या होता है ?
सच्चा और असली सन्यास तब शुरू होता है, जब हमारे में सिर्फ एक ही भूख या कहो प्यास काम करती है, कि जब अब मैंने आपने असली रूप में ही लीन  होना है।  ऐसा  व्यक्ति ,जिस के मन ने सन्यासी रंग पहन लिया हो, जिस ने जीवन की समझ को समझ लिया हो, जिस में खुदा की चाहना भी नहीं रहती, बस खुद में ही फ़ना  होने की लग्न पूरे जोश में और सब्र में  ब्रह्माण्ड की ओर  देखती है। ऐसा व्यक्ति सम्पूर्ण सन्यासी है। 
और यह बात भी बिलकुल सच है कि हमारा रूप कोई भी हो, जब हम संसारी जीवन से ऊबते हैं तो हमारे में उदासी आएगी ही।  उदासी को दूर करने के लिए हम किसी ऊपर की ओर  देखेंगे ही। हम इस ऊपर के लेवल को  खुदा भी कह सकतें हैं, ज़िंदगी का सब से ऊचा तल भी कह सकतें हैं, और आत्मा भी कह सकतें हैं। 
आज पेड़ के हर पत्ते में सन्यासी तरंगें हैं, जो मेरी रूह को लुभाती है और मेरे को ज़िंदगी का संन्यास सीखती है। यह जो हमारी लफ़्ज़ों के वग़ैर  ही  आपस  में वर्तालाप हो रही है, मैंने देख रही हूँ कि कैसे मेरे हर तरफ का माहौल चुप हो के इस को सुन रहा है।  क्योंकि तरंगें कभी ख़त्म  नहीं होगी और यह तरंगें खुद का औरा  बढ़ाती जायेगी। 
मैंने पुछा पेड़ से कि सन्यासी मन कैसा होता है ?
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How a New Kind of thought Improved My personality in a month- part 2

 

In our common life, if we ask anyone whether you want money or God. So our answer will be money. Why? Because we want to clean that place first, we get up and sit at the place.
 Here too, whether we are standing or sitting, making that place clean, beautiful and capable of living from all sides is the first step of our life.
 Now how do we complete our first step?
 We want to be successful from all sides, how will they happen?
To understand and to know is always oneself, to recognize and to believe is always to another. That means always understand the subject and know it. Identifies and believes the object.
When we know the subject, then when we use the information of the subject. How we use our knowledge, it introduces us to our understanding. Just like when we identify the object, then we recognize this identity, which is made towards the object. Because this is true for us. We believe that which is true for us, and no one else.
Now we can get this question that we have divided the four questions into two parts. It is to understand and know for the subject and to recognize and believe it is for the object. We can reverse these as well, why not do them like this?
Whatever questions are on our mind, they are written on a copy. Because if we attacked these four questions from all four sides, then we will meet them standing at the same point, and we have to take these questions with ourselves step by step, through these four questions only Become expert with the art of living in life.
We have always known ourselves. How to know yourself Today, first of all, we have to see what thinking is going on in our mind. We have made this thinking an object for you today. 

Thought :
What thinking is going on in me now?
Thinking about this thought brought me on to me.
 Thought !
 What am i thinking This question brought me to the present tense.
Thought!
 Now I have to think on my thinking, that means I have made thinking an object and now I have to go to the root of this thinking. Past of this - present and future you have to test in the lab of the mind.
Like now I am thinking how do I send this article to all of you?
 Like my friend is thinking in his mind that how can she explain to her son?
Now we will know ourselves out of these two thoughts. This information of ours will become our understanding. Thinking is my own, I have made my own thinking an object, so when the identity of thinking comes to me, it will become my obey. Now solve all four questions in one step.
One thinking is mine and one friend's thinking 

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 हमारी आम ज़िंदगी में ही अगर हम किसी को भी यह पूछें कि आप को पैसा चाहिए या खुदा।  तो हमारा जवाब पैसा ही होगा।  क्यों? क्यों कि हम पहले उस जगह को साफ़ करना चाहतें हैं, जगह पर हम उठते, बैठते हैं। 
 यहाँ पर भी हम खड़े हैं या बैठे हैं, उस जगह को हर तरफ से साफ़, खूबसूरत और रहने के काबिल बना लेना ही हमारी ज़िंदगी का पहला कदम पूरा होता है। 
 अब हम खुद के पहले कदम को पूर्ण कैसे करेंगे?
 हम हर तरफ से कामयाब होना चाहता हैं, वो कैसे होंगे ? 
समझनाऔर जानना सदा खुद को होता है, पहचाना और मानना सदा दूसरे को होता है।  मतलब कि सदा ही सब्जेक्ट को समझना है और जानना है।  ऑब्जेक्ट को पहचाना और मानना है। 
जब हम सब्जेक्ट को जान लेते हैं तो हम सब्जेक्ट की जानकारी को जब उपयोग करतें  हैं।  हम हमारे जानने को  कैसे उपयोग करतें हैं, यह उपयोगता हम को हमारी समझ से मिलवाती है। ऐसे ही जब हम ऑब्जेक्ट को पहचान जातें हैं तो यह पहचान, जो ऑब्जेक्ट के प्रति बनी है, इस को ही हम मानतें हैं। क्योंकि हमारे लिए यही सच  होता है।  जो हमारे लिए सच होता है, हम उस को ही मानते हैं, और किसी को नहीं।  
अब हमारे में यह सवाल आ सकता है कि हम ने चार सवालों को दो हिस्सों में कर दिया।  समझना और जानना यह है सब्जेक्ट केलिए और पहचाना और मानना यह है ऑब्जेक्ट के लिए।  इन को हम उलट  भी कर सकतें हैं, ऐसे क्यों नहीं करतें ?
जो जो भी सवाल हमारे दिमाग़  में आतें हैं, उन को एक कॉपी पर लिखते जातें हैं।  क्योंकि अगर इन चार सवालों पर हम ने चारों तरफ से हमला किया तो  यह एक ही बिंदु पर खड़े हुए हम को मिलेंगे, और हम ने इन  सवालों को कदम कदम पर  खुद के साथ ले के चलना है ता जो इन चार सवालों के ज़रिये ही हम ज़िंदगी में जीने की कला से माहिर हो जाएँ। 
हम ने सदा खुद को जानना है।  खुद को कैसे जानना है ? आज सब से पहले हम ने यह देखना है कि हमारे मन में कौन से सोच चल रही है ? इस सोच को हम ने आपने लिए आज ऑब्जेक्ट बना लेना है।


  सोच :
अब मेरे में कौन सी सोच चल रही है ?
यह सोच के प्रति सोचना ही , मेरे को मेरे पर ले आया। 
 सोच !
 मैं क्या सोच रही हूँ ? यह सवाल ही मेरे को वर्तमान काल में ले आया। 
सोच!
 अब मैंने अपनी सोच पर विचारना है, मतलब कि सोच को ऑब्जेक्ट तो बना किया और अब मैंने इस सोच की जड़ तक जाना है।  इस का पास्ट- वर्तमान और future  को आपने मन की प्रयोगशाला में टेस्ट करना है। 
जैसे अब मेरे में सोच चल रही है कि मैं कैसे आप सब लोगों के पास खुद के इस लेख  को भेजूं ?
 जैसे मेरी दोस्त कि मन में सोच चल रही है कि वो आपने बेटे को कैसे समझाए?
अब हम इन दो सोचों में से खुद को जानेंगे।  हमारी यह जानकारी हमारी समझ बन जायेगी।  सोच मेरी ही है, मैंने खुद की सोच को ही ऑब्जेक्ट बना लिया, सो सोच की पहचान जब मेरे को आएगी, वो मेरे लिए मानता बन जायेगी।  एक कदम में चारों सवालों को अब हल करतें हैं। 
एक खुद की सोच को और एक दोस्त की सोच को 

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How a New Kind of thought Improved My personality in a month- part 1


 This is what I learned and understood from life and also learned that every human being needs one thing very much, that is education. Education is not that one should have a degree, education should be one with which a person can understand life. What is knowing? What is understanding? What is recognized? And what to believe? When we understand these four questions, then the art of living comes in us. This art is such that life gets embodied in the veneer of health. Because we start seeing life so deeply that diseases are far away and we live life at the highest level. I will share these four questions with all of you from different direction and from different condition.

From today onwards, we will follow the path of life that makes life an art 

and tells you how to live!




मैंने ज़िंदगी से यही जाना और समझा और सीखा भी यही है कि हर इंसान को एक चीज़ की बहुत ही ज़्यादा ज़रुरत है, वो है एजुकेशन।  एजुकेशन वो नहीं चाहिए, कि उस के पास डिग्री आ जाए , एजुकेशन वो चाहिए जिस के साथ व्यक्ति को जीने की समझ आ जाए।  जानना क्या होता है ?समझना क्या होता है ? पहचाना क्या होता है ? और मानना क्या है? जब हम  को इन चार सवालों की समझ आ जाती है तो हमारे में जीने की कला आ जाती है। यह कला ऐसी है कि ज़िंदगी तंदरुस्ती के लिबास में सज जाती है।क्योंकि  हम इतने गहरे से जीवन को देखना शुरू कर देतें हैं कि रोग तो दूर होतें ही हैं  और  हम ज़िंदगी को अधियत्मिक लेवल पर जीन लगतें हैं।  इन चारों सवालों को अलग अलग दिशा से और अलग अलग दशा से आप सब के साथ सांझा  करूंगी।   


आज से हम ज़िंदगी के उस राह पर ही चलेंगे जो जीने को कला बना दे 

और जीना का सलीका बता दे !


After death, taking love is my last job

miraculous experience of unique question 


Today's experience is the grandfather of all experience. Today I thought all day what should I do? What is the work in life, which is capable of doing, which even if thought about, would have ended its death. Not only of my experience, the answer to every question would also stop at death, the character of my thinking would also stop at death, every relationship would also stop at death, so what should I do to get ahead of death?

Which step, which thought, which emotion, or which character is such that one who crosses death, this thinking was my way to this day and I traveled 12 hours on this path.

So in the deep atmosphere of silence I asked the moment how to use you, because if I use the moment properly, this moment will become my guide.

When I was not feeling anything, I prayed to God that now you can come and live this moment. (God means the deepest conscious form) I had said that as soon as the old door opens on a far distance and the sound of its opening, the same voice comes to me. As if somewhere far away, an undiscovered door is open. I cannot see, but I go inside it. My entry into a very calm environment is such that as soon as my step was in that dimension, then that dimension rose on my breath. Everything in me was moving in that dimension.

I also remembered this morning what I had said and what experience I was looking for. Right now I could not understand what all this is, and why it is happening, but I saw that a dimension is living on my breath.

I was passing through a pale pink color and a faded purple aura. It was as if it was a tunnel. My heartbeat remained the beat of all dimensions. I was surprised that such a big dimension depends on my breath and it is growing.


Now how do I separate myself from this dimension?

I thought that if I stop my breath for a few moments?

To complete this thinking, I first looked at everything everywhere. When I looked at it comfortably, I stopped taking breath.

First of all I felt the cold air coming from my ears.

The whole dimension is very powerful, something happened in just one place. There was no blowing of air there. The agony of that place could not withstand even from me and I breathed quickly. How I was deeply involved with all of them, it was a unique incident for me too, but I was going through all of it comfortably. This was a huge dimension, from which it took 100 births to pass through me.

 Now I had to go out.

 I noticed that when one of my steps was out of this dimension, some part of the dimension fell like buildings falling when earthquake occurred. But I had to go out, as soon as I had taken the second step out, I saw that there was no such dimension there, it disappeared as if the dream disappears upon waking up. I repeatedly look back and see if there was really anything there?

This question got entangled in my mind.

 And when I look ahead of myself, the same dimension, in which I am just like a particle, is ahead of me. That small dimension took a very big form. The story all turned upside down.


 Now in this dimension, my breath is not mine but someone else's. I depend on someone else. And I don't like that I depend on anyone. So I have to make the first step my last step, so what should I do now, this question got entangled in me.

Where to go, how to go, which way to go, I don't know anything, just know that I have never depended on any other breath. I had just closed my eyes, I had not spoken anything yet, so the sound of the old door came again from somewhere far away. So, when I comfortably opened my eyes, I was in such a place, from now on I could see both the dimensions.

The first was my body and the second was the visible and invisible universe. Now I was there, from here both these dimensions were within me and I was still outside. There is no thought or feeling called death and life.


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अनूठे सवाल का निराला अनुभव 


आज का अनुभव  सब अनुभव का दादा है।  आज मैंने सब दिन यही सोचा कि मैं क्या करूं ? ज़िंदगी में ऐसा कौन सा काम है, जो करने के काबिल है, जिस के बारे में भी सोचती, तो उस का खत्म मौत पर जा के रुक जाता।  मेरे हर अनुभव का ही नहीं, हर सवाल का जवाब भी मौत पर रुक जाता, मेरी हर सोच का किरदार भी मौत पर रुक जाता , हर रिश्ता भी मौत पर रुक जाता, 
तो मैंने ऐसा क्या करूँ कि जो मौत से आगे निकल जाए ?

कौन सा कदम, कौन सी सोच, कौन सी भावना,  या कौन सा किरदार ऐसा है कि जो मौत को क्रॉस कर दे , यह सोच आज के दिन के लिए मेरी राह थी और मैंने १२ घंटे इस राह पर यात्रा की। 

तो मैंने साइलेंस के गहरे माहौल में पल से पुछा कि मैं तेरा कैसे इस्तेमाल करूं , क्योंकि अगर मैंने पल का सही इस्तेमाल कर लिया तो, यह पल मेरा मार्ग-दर्शक बन जाएगा। 

जब मेरे को कुछ भी सूझ नहीं रहा था, तो मैंने खुदा से प्रार्थना की कि अब आप ही आके इस पल को जीओ। ( खुदा का मतलब कि सब से गहरा चेतन-रूप ) ऐसा मैंने कहा ही था कि जैसे बहुत पुराना दरवाज़ा कहीं दूर पर खुलता है और जैसे उस के खुलने की आवाज़ होती है, वैसी ही आवाज़ मेरे को आती है।  जैसे कि कहीं दूर, बहुत दूर कोई अनदेखा दरवाज़ा खुला है।  मैं देख नहीं सकती  पर मैं उस के भीतर चली जाती हूँ।  बहुत ही शांत वातावरण में मेरा प्रवेश ऐसे होता है कि जैसे ही मेरा कदम उस आयाम में पड़ा तो मेरी सांसे  पर ही वो आयाम जी उठा।   मेरे भीतर की सब हिलजुल उस आयाम की हिलजुल बनी हुई थी। 

मेरे को आज की सुबह भी याद थी कि मैंने क्या कहा था और मैं किस अनुभव की तलाश में थी।  अभी मेरे को यह समझ ही नहीं आ रही थी कि यह सब क्या है, और यह क्यों हो रहा है, पर मैंने यह देख लिया कि मेरी सांसों पर एक आयाम जी रहा है। 

हल्के गुलाबी रंग और फीका जामनी रंग  की आभा में से मैं गुज़र रही थी।   ऐसे लगता था कि जैसे यह कोई सुरंग है।  मेरी धड़कन ही सब आयाम की धड़कन बनी हुई थी।  मैं हैरान हो गई कि मेरी साँसों पर इतना बड़ा आयाम निर्भर है और पल रहा है।  


अब मैं खुद को इस आयाम से अलग कैसे करूं ?

मैंने सोचा कि अगर कुछ पल मैं अपनी साँसों को रुक दूं  तो?

यह सोच को पूरा करने के लिए मैंने पहले सब ओर आराम से देखा।  जब पूरे आराम से देख लिया तो मैंने साँसों को लेना बंद कर लिया। 

सब से पहले मैंने आपने ही कानों में से आ रही ठंडी हवा को महसूस किया। 

 सब आयाम बहुत ही शक्तिशाली है , सिर्फ एक जगह पर कुछ होने लगा था।  वहां पर हवा का झोँका नहीं जा रहा था।  उस जगह की तड़फना मेरे से भी झेली न गई और मैंने झट से साँसें ले डाली।  कैसे मैंने उन सब के साथ गहरे में जुडी हुई हूँ, यह मेरे लिए भी अनूठी वारदात थी, पर मैंने आराम से सब में से गुज़र रही थी। यह बहुत ही बड़ा आयाम था, जिस में से गुज़रते हुए मेरे को १०० जन्म लग गए। 

 अब मैंने बाहर जाना था। 

 मैंने देखा कि मेरा एक कदम जब इस आयाम से बाहर हुआ था,  आयाम का  कुछ हिस्सा ऐसे गिरा, जैसे भूचाल आने पर इमारतें गिरती हैं।  पर मैंने बाहर जाना ही था, जैसे ही मैंने आपने दूसरा कदम बाहर रखा था तो देखा कि वहां पर वो आयाम है ही नहीं था, सब ऐसे गायब हो गया जैसे जागने पर सपना गायब हो जाता है।  मैं बार बार पीछे की ओर  मुड़  कर देखती हूँ कि कहीं सच में ही वहां पर कुछ था?

यह मेरा सवाल मेरे जेहन में धस कर बैठ  गया। 

 और मैं खुद के आगे की ओर देखती हूँ तो वोही आयाम , जिस में मैं सिर्फ एक कण जैसी हूँ, मेरे आगे है।  उस छोटे से आयाम ने बहुत बड़ा रूप धारण कर लिया।  कहानी सब उल्ट हो गई। 

 अब इस आयाम में मेरी साँसें मेरी नहीं, किसी ओर  की है।  मैं किसी ओर पर निर्भर हूँ। और मैं यह पसंद नहीं करती कि मैं किसी पर निर्भर हूँ।  सो पहले ही कदम को मैंने अब अपना आख़री  कदम बनाना है , तो अब मैं क्या करूं , अब यह सवाल मेरे में  धस गया। 


कहाँ जाऊं , कैसे जाऊं, किस तरफ़  जाऊं, कुछ भी नहीं पता , सिर्फ यह पता है कि मैंने किसी ओर की सांसें पर कभी निर्भर नहीं होना।  मैंने अभी आँखों को बंद ही किया था, अभी मैं कुछ बोली भी नहीं थी ,तो वहीँ पुराने दरवाज़े की आवाज़, कहीं दूर से फिर आई। तो, जब मैंने आराम से खुद की आँखों को खोला तो मैं  एक ऐसे जगह पर थी, यहाँ पर से अब मुझे दोनों ही आयाम दिखाई दे रहे थे। 

पहला मेरा जिस्म था और दूसरा  दिखाई देने वाला और ना दिखाई देने वाला  ब्रह्मण्ड था। अब मैं वहां पर थी, यहाँ पर से यह दोनों आयाम मेरे ही भीतर थे और मैं  फिर भी इन से बाहर थी।   मौत और ज़िंदगी नाम की कोई भी सोच या भावना नहीं है।  









How Much is 'awareness' Costing Your life?


Nirvana journey of flower

 Today, I asked the flower how are you such a full blossom?
 So the flower said,
 "When I am here with life and in life, I am here only; I am completely here so that I can understand the science of this new movement of nature and identify myself. Because I have seen and understood that we are born in time, that we can go into eternity.
Time is the world and eternity is God; Horizontal is the world, vertical is God. From here and now I can go on two trips:
One: My journey in the world, which I shall call the future.
Secondly in my journey to God, which I shall call depth of reality. ''
I again asked that the statement of depth be told openly.
So the flower said again,
"Depth" means that as my seed sprouts and I start taking form, color and  shape. So when my awareness for this form also increases, then I see how I get vastness, bigger and freer in my growing color and shape form. ''
Then I quickly asked the flower how it was?
Flower said,
"My awareness of me makes me so sensitive that if I recognize the tree lying in the seed, it also recognizes the space lying in the seed. Meaning that my deep awareness knows both the shape and the formless very well. So when we become more and more vigilant and sensitive towards ourselves in our present, these two parts will be born together in the same way. Now when you look at me, just calm down and look deeply, then you will never ask anyone anything, only your deepest view will tell you everything.''
When I looked at the flower before leaving, I knew the same and also understood that the flower had blossomed in my own consciousness. And today, on my asking, the flower that had just blossomed, also awakened its consciousness.
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छोटी सी वर्तालाप 

फूल की निर्वाणा यात्रा 


आज मैंने फूल से पूछा कि तू ऐसे पूर्ण खिला कैसे हैं ?
 तो फूल ने कहा,
 '' जब मैं यहाँ पर ज़िंदगी के साथ हूँ, ज़िंदगी में हूँ, तो मैं सिर्फ यहीं पर हूँ; पूरी तरह से यहीं पर हूँ ता कि मैं प्रकीर्ति के इस नए आंदोलन की विद्या को समझ सकूं और खुद को पहचान सकूं। क्योंकि मैंने देखा और  समझा यही है कि हम वक़्त में पैदा होतें हैं, ता कि हम अनंत काल में जा सकें।  
समय संसार है और अनंत काल भगवान है; क्षैतिज दुनिया है, ऊर्ध्वाधर भगवान है। 
यहां से और अब मैं दो यात्रा पर जा सकते हूँ :
एक: दुनिया में  मेरी यात्रा, जिस को मैं भविष्य ही कहूंगा। 
दूसरी मेरी यात्रा परमात्मा में, जिस को मैं गहराई  ही कहूंगा।''
मैंने पुछा फिर से कि गहराई की बात ज़रा खुल कर ब्यान कर दो। 
तो फूल ने फिर से कहा,
''गहराई का मतलब कि जैसे मेरा बीज अंकुर होता है और मैं रूप रंग आकार लेने लगता हूँ।  तो इस रूप रंग के लिए जब मेरी जागरूकता भी  बढ़ती है तो मैं देखता हूँ कि कैसे मैं खुद के बढ़ते रंग रूप आकार में ही  विशाल, विराट और आज़ाद होता जाता हूँ। ''
 मैंने फिर झट से पुछा कि वो कैसे ?
फूल ने कहा,
'' मेरी मेरे प्रति जागरूकता , मेरे को ऐसा संवेदनशील बना देती है कि मैं बीज में पड़े जैसे पेड़ को पहचान लेता हूँ, वैसे ही बीज में पड़े स्पेस को भी पहचान लेता है।  मतलब कि मेरी गहरी जागरूकता आकार  को और निराकार दोनों को ही अच्छी तरह जानती जाती है। सो जब हम खुद के वर्तमान में ही खुद के प्रति ज़्यादा से ज़्यादा और गहरे से गहरा  सतर्क और संवेदनशील बनेंगे तो यही दोनों हिस्से वैसे ही एक साथ जन्म लेंगे।   अब जब तुम मेरी ओर  देखोगे तो बस शांत हो के गहरी दृष्टि से देखेंगे तो फिर कभी भी आप किसी से भी कुछ पूछोगे नहीं, तुम्हारी गहरी देखनी ही आप को सब बता देगी।''
जब मैंने जाने से पहले फूल की ओर देखा तो मैंने यही जाना भी और समझा  भी कि  फूल मेरी ही चेतना में खिला हुआ था। और आज मेरे पूछने से ,जो फूल खिला ही हुआ था, उस की चेतना भी जाग गई। 

Don't let the feet hit the ground

 From countless end to infinity


When the pulse of life becomes the identity of a person, 
then life becomes a very beautiful game




There are infinite parts of life and there are infinite ways to see it, understand it, which then go towards infinite directions.
 But the destination is one. This infinity leads only to that one. Despite being infinite, the end is only on one. The art of seeing a small particle also opens the door to that infinity. No matter what dialect or any words, all of them also knock at the door of infinity.
Whenever the freshness of the morning opens the door of my eyes, it also opens a new window to the art of seeing life.
God can be earned not just by religious name but by every name
God can be earned everywhere, not only from a religious place

Only we need our powerful trust. Trust is a weapon that does not need war, which wins at the end, no matter the direction.
 Just like our face should be towards the sun to see the sun, in the same way our face should also be towards God.
I see that in every step, in every direction, in every moment, in every breath, in every color, in every form, in every shape, in every thought, in every emotion, there is the same taste.
Just like we eat anything for hunger, in the end only blood is formed, then only the breath of life goes on, do whatever, finally you have to enter yourself, stop at the same, stay at the same, there What is, is true, only that is true.

What is needed to see and understand this?
Just one thing,
 Wish money or god
Relationship or name
 Just want awareness, nothing else.









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जब ज़िंदगी की नब्ज़ व्यक्ति की पहचान बन जाती है, 
तब ज़िंदगी बहुत ही खूबसूरत खेल  बन जाती है 



बे-अंत से अनंत की ओर 

ज़िंदगी के चाहे अनंत हिस्से हैं और  इस को देखने की, समझने की , फिर अनंत राहें हैं, जो फिर अनंत दिशों की ओर  चली जाती है।   
 पर मंज़िल एक है।  यह अनंतता उस एक की ओर ही जाती है।  अनंत होने के बावजूद भी अंत एक पर ही होता है। एक छोटे से कण को देखने की कला भी उस अनंतता का दरवाज़ा खोल देती है।  कोई भी बोली हो या कोई भी अलफ़ाज़ हो, वो सब  भी अनंतता के दरवाज़े पर दस्तक दे देता है। 
जब भी सुबह की ताज़गी मेरी आँखों के दरवाज़े को खोलती है तो साथ ही ज़िंदगी को देखने की कला  के लिए नई खिड़की भी खोलती है।  
खुदा को धार्मिक नाम से ही नहीं, हर नाम से कमाया जा सकता है 
खुदा को धार्मिक जगह से ही नहीं, हर जगह से कमाया जा सकता है

सिर्फ हम को हमारा शक्तिशाली भरोसा चाहिए। भरोसा एक ऐसा हथियार है, जिस को जंग की ज़रूरत नहीं होती, जो आखिर को जीतता ही है, दिशा कोई भी हो। 
 जैसे सूर्य को देखने के लिए हमारा चेहरा सूर्य की ओर होना चाहिए, बिलकुल वैसे ही हमारे मन का चेहरा भी खुदा की ओर होना चाहिए। 
मैं देखती हूँ कि हर कदम में , हर ज़र्रे में, हर पल में, हर सांस में, हर रंग में, हर रूप में, हर आकार में, हर सोच में , हर भावना में, एक ही स्वाद है। 
जैसे हम भूख केलिए कुछ भी खाएं, आखिर में खून ही बनता है, तो ही ज़िंदगी की साँसैं चलती है , वैसे ही कुछ भी करो , आखिर में खुद में ही प्रवेश करना है,  वही पर रुकना है,  वही पर ठहरना है, वहां पर जो है, वही सच है, सिर्फ वो ही सच है।  


यह देखने और समझने के लिए क्या चाहिए ?
सिर्फ एक ही चीज़,
 धन कामना है या खुदा 
रिश्ता  है या नाम 
 सिर्फ जागरूकता चाहिए, और कुछ भी नहीं।

















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 Natural Walking

This is my journey, I keep going, but in which direction or towards which direction am I not knowing anything. I only know that if the journey has started, it will end somewhere, maybe today and now. How will it end? The martyr started as it was. My experience of this journey has been that I could never become the inspiration of anyone, but my inspiration should be all that I get; Whether it was a flowing waterfall, singing birds, dancing air, swaying trees, blossoming flowers, the rising sun or the hiding sun, shining stars or thundering clouds, any community or any country or any thief, Or a saint. Did i get it? I was born as an unknown little particle. Even though I am still unknown today, I am not a particle, but a great one. Which has countless twinkling stars of experiences, like an open sky.

सुभाविक चलना 

यह कैसी यात्रा है मेरी, मैं चलती जा रही हूँ, पर किस दिशा की ओर जाती हूँ या किस राह पर हूँ , कुछ भी नहीं जानती। सिर्फ यही जानती हूँ कि अगर सफर शुरू हुआ है तो कहीं पर समापित भी होगा,  शायद आज और अभी हो जाए। समापित कैसे होगा ? शयद वैसे ही जैसे शुरू हुआ था। मेरी इस यात्रा का अनुभव यही रहा है कि मैं कभी किसी की प्रेरणा नहीं बन सकी, पर मेरी प्रेरणा वो सब बने, जो भी मेरे को मिले ; चाहे वो बहता झरना था, गाते पक्षी थे, नाचती हवा थी, लहराते पेड़  थे , महकते फूल थे, चढ़ता सूर्य था या छुपता सूर्य , चमकते तारे थे या  गरजते बादल , कोई भी कौम थी या कोई भी मुल्क  या फिर  कोई भी चोर था या या कोई संत। मिला क्या मुझ को ?- मैं अनजाना छोटा सा कण बन कर पैदा हुई थी।  चाहे मैं आज भी अनजानी हूँ पर आज  मैं कण नहीं,  विराट हूँ। जिस में अनुभवों के अनगिनत चमकते सितारों का साथ है, एक खुले आसमान की  तरह।  

Improve Your Era in Just a minute Per Day


 Is there any mystery in this shape of ॐ?


What is ॐ, is it not shaped by a unique experience or is it a story of a sage to whom it has been given? Have you ever thought about ॐ? If you have done, then identify me with that thought, if not, should you come with me?
Once I went to the 'Upasana Meditation Camp' in Vancouver (Canada). Our teacher instructed us to pronounce this name as I say. I would have done that name in just 5 minutes that I started getting inspiration from within me that I want to pronounce ॐ, not this name. So I started pronouncing ॐ according to the inner inspiration. It just went awesome. The first time I was inbound with ॐ. After that my love became even deeper with ॐ. I had such a deep intoxication of ॐ that if I had seen ॐ's sign somewhere, I would have been absorbed in ॐ itself. If someone had listened to ॐ's speech from his tongue, I would have reached the dimension of silence.

I felt that my relationship with ॐ is very old.
My journey with ॐ was 3 years. One such time I wondered why ॐ has been given this amazing shape. Is there any secret in this shape? Why the sage who gave this shape, he gave it, I just want to know it. I prayed before the universe, before God, and before life. As seeds were sown and now the harvest is awaited.
What is ॐ? Is there any mystery in this shape of ॐ? Do you see any mystery?
  I can see, so today I will introduce my experience with ॐ. Look at ॐ's photo carefully and understand.
Now look at ॐ's shape carefully:
ॐ:  ॐ is the statement of a sage's position.
 ॐ is a description of the spiritual dimension.
Which is 'उ': The top of it is opened, it is the symbol of  'उ' heart.

That which is the circle with 'उ'is the symbol of the key. How that understanding of the cycle of life opens up the cycle of the heart. How the third etra becomes active when the heart chakra opens upwards.
Meaning that ॐ is a sign of a sage's position, indicating that the sage's heart and third netra are open.
Or we can simply say that when a person's position is this, that person is in the spiritual dimension. We can also call this self-realization.
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 क्या ॐ के इस आकार में कोई रहस्या है 


ॐ क्या है, क्या यह किसी अनोखे अनुभव को आकार तो नहीं दिया गया है या किसी ऐसे ऋषि की कोई कहानी हो, जिस को यह आकार दिया गया हो ?  क्या  आप ने कभी ॐ के बारे में विचार किया ? अगर किया है तो मेरी भी उस विचारता के साथ पहचान कराइये , अगर नहीं किया तो आओ मेरे साथ चाहिए ?
एक बार मैं Vancouver (Canada  ) में 'उपासना  मैडिटेशन कैंप' पर गई।  हमारे टीचर ने हम को हदायित  दी कि ,जो मैं कहता हूँ, वैसे ही इस नाम का उच्चारण   करो।  मैंने उस नाम को सिर्फ  ५ मिनट्स ही किया होगा कि  मेरे को मेरे ही भीतर से प्रेरणा मिलने लगी कि इस नाम को नहीं, ॐ का उच्चारण  करना है।  सो मैंने भीतर की प्रेरणा के हिसाब से ॐ का उच्चारण करना शुरू कर दिया।   बस कमाल ही गई थी।  पहली बार मैं ॐ के साथ भीतर की यात्रा थी।   उस के बाद मेरे प्यार ॐ अलफ़ाज़  के साथ भी गहरा हो गया।  मेरे में ॐ  का इतना गहरा  नशा हुआ था कि  अगर मैं ॐ  का कहीं पर sign  भी देख लेती, तो मैं ॐ में ही लीन हो जाती।  अगर किसी की जुबां से ॐ का अलफ़ाज़ सुन लेती, तो मेरे में  चुप के आयाम में पहुंच जाती। 

मेरे को लगा कि  ॐ के साथ मेरा रिश्ता बहुत पुराना है। 
ॐ  के साथ मेरी यात्रा ३ साल रही।  ऐसे ही एक बार मेरे में सोच आई कि ॐ को यह एक अद्भुत आकार क्यों दिया गया है?  कहीं इस आकार में कोई रहस्य तो नहीं?  जिस  ऋषि ने भी यह आकार दिया, उस ने क्यों दिया , बस मेरे को यह जानना है।  मैंने ब्रह्माण्ड के आगे, खुदा के आगे, और ज़िंदगी के आगे प्रार्थना की।  जैसे बीज बो दिए और अब फसल का इंतज़ार है। 
ॐ क्या है ? क्या ॐ के इस आकार में कोई रहस्या है ? क्या आप को कोई रहस्या दिखाई देता है ?
 मेरे को दिखाई देता है , सो आज मैं मेरा वो अनुभव, जो ॐ के साथ हुआ था, उस से मिलवाती हूँ। 
अब ॐ की आकार  को ध्यान से देखना:
ॐ :  ॐ एक ऋषि की पोजीशन का ब्यान है। 
 ॐ आत्मिक आयाम का वर्णन है। 

जो 'उ'  है : इस का ऊपर की ओर  खोला गया है , यह 'उ'  दिल का प्रतीक है। 
जो 'उ'   के साथ चक्रा है, वो कुंजी का प्रतीक है।  कैसे कि ज़िंदगी के चक्रा  की समझ दिल के चक्रा को खोल देती है।  जब दिल का चक्रा ऊपर  की ओर खोलता है तो कैसे तीसरा नेत्रा एक्टिव हो जाता है। 
मतलब कि ॐ एक  ऋषि की पोजीशन का चिन है जो कि यह बता रहा है कि ऋषि  का दिल और तीसरा नेत्रा खुल चुक्का होता है।  
या हम इस को सरल रूप से ऐसे कह सकतें हैं कि जब व्यक्ति की पोजीशन यह होती है तो वो व्यक्ति आधियात्मिक आयाम में होता है।  इस को हम self -realization भी कह सकतें हैं।   


Proven method: Master a New in living in 3 month -part 2

Let's enjoy this stage of life too

When I was writing yesterday, my mind was moving along with the thought that what can I do then?
If there are parts of life that I cannot even think of, then there must be some that I can enter that part of my life without any hesitation, what are they, about them today Let's talk something
First of all:
1. I can call any unknown person quickly, I can talk to him/her. In the same way if I am hungry, but I do not eat hotel food outside, then I immediately tap the door of any house and say comfortably that I am hungry and I have to eat the food of the house. So give me food. Like any business person, you have to buy something from him/her, how is his behavior, according to behavior, I give the value of the thing.
 (This happens in India) 
In America, there are people with such work, wherever I go, just friendship. I take the thing, just as we in India give some gifts in the form of love, so I give the money as a gift. Meaning that no matter what part of life, no matter how unknown, I never feel anything unknown, just mine and I belong to them. This feeling works in me. That means I call the person going on the road, and I have dinner with him /her. Who will give money - The decision of this is based on the conversation of both. Meaning that every worldly thing belongs to me. 

There is no need to claim to be the owner, just the sentiment should be pure and genuine.
2- I also do this work very quickly. Bus or train. Everyone has to eat together. Here the same thinking works, do it either eat food from me or feed me with you. There is no other choice, just have to do it. For example, ask the people sitting in the train whether you will change your food with me today. Whether it is a train or air plane , there is no difference, because every Indian passenger carries food with them. When I have to travel, I always have something to eat for 10 to 20 people.
3- The most beautiful thing I can do is that I am a very helpful person. My action for the truly needy, my thinking, my walking with the needy, has been a blessing till date. I never turn back.
4 - Never delay in taking action. The action that will be good for everyone, whether I get the title of brainless, it doesn't matter to me. Because I have love in my heart and I love everyone. If someone make a mistake again and again, even if I start staying away from that person, I never get away.
5 - I always saw for myself that my fault would not be borne by me. Mistake is never tolerated by me, so when I make a mistake, it becomes very difficult for me to be with me. Even if the mistake tells me that now your thinking, the way of your life has started changing, but the mistake will always run in my veins as blood. The pungent pain of mistake always keeps my wounds fresh, never lets the wounds go. I can never bear my fault. If I can't bring back the time, what should I do? I made no mistake the second time. I have made a lot of mistake, it still happens today, because it is a singular symbol of life's revenge.
6- My best quality is that I have a very strong feeling of sacrifice. Whether it is a environment or a situation, if it causes damage, life or time, it is very easy for me to leave it.
7- If someone's love has come to me, then I say it immediately, just like when I abuse someone, even if I abuse myself in my heart, but I also tell him/her immediately.
It is my nature, which describes itself, by taking such action. Despite this nature, I have not been with anyone till date.
Why?

Like:
Because the mother wanted a daughter. I could not become such a daughter. Because I could see God in every woman. The difference has never happened to me, so I failed.
Whatever it is, it is like that, it had to be like that, whatever it is, it is just mine, it was my understanding. Everyone will like me, but will not walk with me, because I have no limits, I have seen my life like a sky and lived in such a life, and will live like this forever.
Because I know how it is, after all we are all the same. My path is silent and empty, nothing is visible far, but it is very beautiful and very deep. Today I am walking, so the joy of this walk is unmatched and wonderful.



***---***

चलो ज़िंदगी के इस मुकाम का भी मज़ा ले लें 

जब मैं कल लिख रही थी तो मेरा दिमाग साथ साथ ही इस सोच को ले के चल रहा था कि, फिर मैं क्या क्या कर सकती हूँ?
अगर  ज़िंदगी के कुछ हिस्से ऐसे हैं कि जिन में मेरी सोच दाखिल भी नहीं हो सकती, तो ज़रूर कुछ ऐसे भी होंगे कि, मैं बिन-झिझक के ज़िंदगी के उन हिस्से में दाखिल हो सकती हूँ , वो कौन से हैं, आज उन के बारे में कुछ बात करतें हैं। 
सब से पहला :
1- किसी भी अनजाने व्यक्ति को झट से बुला सकती हूँ, उस से बात कर सकती हूँ।  ऐसे ही अगर मेरे को भूख लगी हो, पर मैंने बाहर होटल का खाना नहीं खाना तो मैं झट से किसी भी घर का दरवाज़ा थपथपा देती हूँ और आराम से कहती हूँ कि मेरे को भूख लगी है और मैंने घर का ही खाना खाना है।  सो मेरे को खाना दे दो।  ऐसे ही कोई भी काम-धंधे वाला व्यक्ति हो, उस से चीज़ खरीदनी है, कैसे उस का व्यवहार है, व्यवहार के हिसाब से चीज़ का मूल्य  दे देती हूँ।
 (ऐसा इंडिया में होता है ) अमेरिका में जो ऐसे काम वाले लोग हैं, जहाँ पर भी गई, बस दोस्ती।  चीज़ लेती हूँ, जैसे इंडिया में हम सब को प्यार के रूप में कुछ गिफ्ट देतें हैं, तो वैसे ही मैं पैसे को  गिफ्ट के रूप में दे देती हूँ।  मतलब कि ज़िंदगी का कोई भी हिस्सा हो, कितना भी अनजाना हो, मेरे को कभी भी कुछ भी अनजाना  नहीं लगता, बस मेरा है और मैं उन की हूँ। यही भाव मेरे में काम करता है।  मतलब कि सड़क पर जाते व्यक्ति को बुला लेती हूँ, और कुर्सी पर बिठा के उस के साथ खाना खा लेती हूँ।  पैसे कौन देगा - इस का फैंसला दोनों की बातचीत पर आधारित होता है। मतलब कि मेरे लिए हर संसारी चीज़ मेरी है। 
 
मालिक होने का दावा  करने की ज़रुरत नहीं, 
बस भाव शुद्ध और असली होना चाहिए। 
2- दूसरा यह काम भी मैं बहुत जल्दी करती हूँ।  बस हो या ट्रैन।  सब ने मिल कर खाना खाना है।  यहाँ पर एक ही सोच काम करती है कि ऐसे करो या तो  मेरे से खाना खा लो या मेरे को आपने साथ खिला लो।  दूसरी और कोई भी चॉइस नहीं है , बस करना ही है।  जैसे ट्रैन में बैठे लोगों से पूछ लेना है कि क्या आज आप मेरे साथ आपने खाने को चेंज करोगे।   ट्रैन हो या जहाज़  कोई फर्क नहीं , क्योंकि हर इंडियन यात्री घर का खाना साथ लेके ही चलता है।  जब मैंने सफ़र  करना है तो मेरे पास सदा ही  १० से ले के २० लोगों के लिए कुछ न कुछ खाने के लिए होता ही है।  
3- सब  से सूंदर जो मैं कर सकती हूँ , वो यह है कि मैं बहुत अच्छी मददगार हूँ। सच्चे ज़रूरतमंद केलिए  मेरा एक्शन, मेरी सोच, मेरा ज़रूरतमंद के साथ चलना ,आज तक एक दुआ ही रहा है।  मैं कभी लीछे नहीं मुड़ती। 
4- एक्शन लेने में  कभी देरी नहीं करती।  वो एक्शन जो सब लिए अच्छा होगा, चाहे मेरे को बेवक़ूफ़ का खिताब मिले, कोई फर्क नहीं पड़ता मेरे को। क्योंकि मेरे दिल में प्यार है और मैं सब को प्यार करती हूँ।  अगर कोई गलती बार बार करे तो चाहे मैं उस व्यक्ति से दूर  रहने लगती हूँ, पर कभी दूर होती नहीं। 
5- मैंने सदा ही खुद को देखा कि मेरे से मेरी गलती नहीं झेली जाती।  गलती लफ्ज़ ही मेरे से कभी बर्दाश्त नहीं होता , तो जब मेरे से कोई गलती हो जाए, तो मेरा मेरे साथ रहना बहुत ही मुश्किल हो जाता है।  चाहे गलती मेरे को बता देती है कि अब तेरी सोच का, तेरी ज़िंदगी का राह बदलने लगा है, पर फिर भी ग़लती  सदा मेरी  रगों में खून बन कर दौड़ती। गलती की  तीख़ी दर्द सदा मेरे ज़ख्म ताज़ा रखती है, कभी ज़ख्म को जाने नहीं देती। मेरे से कभी मेरी गलती सहन नहीं होती। गलती ते हो गई, वक़्त को वापस ला नहीं सकती तो क्या करूं ?  कोई भी गलती मैंने दूसरी बार नहीं की। मेरे से बहुत गलती हुई  है, आज भी होती है , क्यों कि यह ज़िंदगी की बदलाहट का सिंगनल है।
6- मेरी सब से अच्छी क्वालिटी यह है कि मेरे में त्याग की भावना बहुत ज़बरदस्त है। हालत हो या हालात, अगर इन से नुक्सान होता है, ज़िंदगी का या वक़्त का, उस को छोड़ देना बहुत  सरल  है मेरे लिए।   
7- अगर मेरे को किसी का प्यार आ गया तो झट कह देती हूँ, बिलकुल ऐसे ही जब किसी को गाली देती हूँ, चाहे मैं खुद के दिल में ही गाली देती हूँ, पर झट उस को भी बता देती हूँ। 
यह मेरा स्वभाव है,  जो खुद को ही ब्यान करता है, ऐसे एक्शन ले ले कर।   
ऐसा स्वभाव होने के बावजूद भी ,मेरी आज तक किसी से भी बनी नहीं।  
क्यों ?

जैसे: 
क्योंकि माँ को एक बेटी चाहिए थी।  मैं वैसी बेटी बन नहीं सकी।  क्यों की मेरे को हर औरत में रब्ब दिखाई देता था।  फर्क मेरे से कभी हुआ नहीं, सो मैं फेल  हुई। 
जैसे भी कोई हो , वो ऐसा ही है,उस ने ऐसा ही होना था ,कैसा भी है, बस मेरा है , यह मेरी समझ थी।  मेरे को पसंद हर कोई करेगा , पर  मेरे साथ चलेगा नहीं, क्योंकि मेरी कोई हद नहीं , मैं ज़िंदगी को खुल्ले आसमान की तरह ही देखा है और ऐसे ही ज़िंदगी में रही हूँ, और ऐसे ही सदा जीऊँगी। 
क्योंकि मैं जानती हूँ कि कैसे भी हैं, आखिर में हम सब एक ही हैं।  मेरा रास्ता चुपचाप और ख़ाली है, दूर तक कुछ भी दिखाई नहीं देता, पर बहुत ही सूंदर और बहुत ही गहरा है।  आज मैं चल रही हूँ, तो इस चलने का आनंद बेमिसाल और लाजवाब है। 







रेतली राह का मुसाफ़िर

रेतली राह का मुसाफ़िर
माननीय प्यार , आज मैं खुद को आप के आगे सन्मानित करना चाहती हूँ कि मैं आप की रचना हूँ ; और खुदा के आगे मैं खुद को धन्यवाद का उपहार देना चाहती हूँ कि 'धन्यवाद शहीर ' कि आप ने खुदा से प्यार किया। हर किर्या के लिए धन्यवाद
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