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Have to walk like a Sanyaasi - No Matter what the Path

Mysterious Questions

The story of the mysterious questions:


What if today I come to know that life till date is a false belief, my question takes me on a long journey


Traveling in search of one's true form seems like a very risky job, just like we tell someone to go into a state of deep meditation. Just as people are afraid of silence, of death, of fear, of disease, in the same way a deep panic will be born here, when the question will come in anyone like me that :-

 - What will be left when all the concepts are exhausted?

- Who shall we be?

- How will we see the world?

 - What kind of feelings will we have?

 - How will we see other people?

- What happens after Nirvana?

 - What is beyond the universe?

- What will be the last step of all this life?

 When this world has to end, what is the benefit of it happening again today?

 Is there some other purpose of our life, which no one has come to know till now?

Not all of us know the real to the real, nor do we really know the real reality today, and until we do, there's no way to find out.

Till today every thought, every thought, every belief, every step, every moment, every situation, every situation, if everything proves to be wrong, then I doubt even the sages and mystics, then I surround them all in questions , because my living, my deepest existence wants to be aware of the reality of the universe, and wants to live it before I die.

 Then the question comes to me:

- If today Buddha comes and says that emptiness is not the last step, there is still a lot ahead of him, then?

- If today Krishna says that I did not say the Gita, Arjun had said it, I have got self-realization from Arjuna, then?

- If Jesus says that this is the Bible, I wrote a story, then that story has become a super-hit?

- Or do we find out today that Moses had never spoken to God in the bush on the hill, then?

- If it is also known that Balmik had written a story called Ramayana, then?

- If someone comes today and says that 'I' (anyone) was in Israel at the time of Muhammad, and I had seen Hazrat Muhammad, and I met him and gave me a book by Hazrat Muhammad and said that this The book is very good, it has been given to me by a very noble fakir, you should take this book to the right place, this book is for the good of the world, so?

 We have never seen anyone, till today we have read or heard everything and we have trusted. What if all our trust turns out to be wrong today?

If we assume that all this is true but we see that every day everything changes, thinking changes, relationships change, customs change, fashion changes, time changes, then maybe the reality of life also changes. You go, then?

Let's say religious books have not changed and they are true but things have changed. It may be that reality does not remain constant and then that reality also changes its nature and structure, then?

= How do we know it isn't?

= Who says things don't change?

= Who says that what Buddha said then must still be true?

Do we have any evidence that this should be the case?

It is not easy to give up your trust. Standing completely on your own is not easy. Forgetting everything and standing upright in yourself, and then finding out what is the truth?, is there God or not? what we are? And what is our reality? What is liberation? What is freedom? What is the real reality?

It takes a lot of deep and deep courage to know these questions.

Because we have to be free from all concepts, all yogas, all religions, all customs, all thoughts. Then, when we are just us, then a journey begins. In this journey again, the policy of 'we' that falls on us, then we are not even there, only are there. It has to be our being in itself, neither less nor more - it just remains to be. It is real we, who are pure and beautiful like nature, from here again a journey begins, which is a journey even if not a journey; What is searched is not searched; That which is only – that which is creation in itself.

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अगर आज  मेरे को पता चले कि आज तक का जीवन एक झूठा भरोसा है तो क्या होगा, 

यह मेरा सवाल मेरे को  लम्बी यात्रा पर ले जाता है 

रहस्यमई सवालों की कहानी


खुद के असली रूप की खोज में यात्रा करनी बहुत ही जोखिम वाला  काम लगता है, ठीक वैसे ही जैसे हम किसी को कह देतें हैं कि आप गहरी ध्याना की अवस्था में जाओ।  जैसे लोग चुप से,  मौत से, डर से , रोग से घहबरातें हैं ठीक वैसे ही एक गहरी घहबराहट यहाँ पर जन्म लेगी, जब किसी में भी मेरी तरह ही यह सवाल आएंगे कि :-

 - जब सभी अवधारणाएँ समाप्त हो जाएँगी तो क्या बचेगा? 

- हम कौन होंगे? 

- हम दुनिया को कैसे देखेंगे?

 - हमारे पास किस तरह की भावनाएँ होंगी?

 - हम अन्य लोगों को कैसे देखेंगे?

- निर्वाना  के बाद क्या होता है?

 - ब्रह्माण्ड के पार से पार क्या है?

- इस तमाम जीवन का आखरी कदम क्या होगा?

 - इस सृष्टि ने जब खत्म हो ही जाना है तो आज इस के फिर होने का  फाइदा है ? 

 - क्या हमारे जीवन का कोई ओर तो मक़सद नहीं है, जिस का अभी तक किसी को पता ही न चला हो?

हम सब असली से असली वास्तव को नहीं जानते और ना ही आज और अभी तीक सच में ही असली असलियत को जानते हैं और जब तक हम ऐसा नहीं करते तब तक पता लगाने का कोई तरीका है भी नहीं है। 

आज तक का हर विचार, हर सोच, हर भरोसा, हर कदम, हर पल, हर हालात, हर स्थिति, सब गलत साबित हुई तो मेरे में ऋषि , फकीरों पर भी शक होता है, तो मैं उन सब को भी सवालों में घेरती हूँ , क्योंकि मेरा जीना, मेरा गहरे से गहरा वजूद ब्रह्माण्ड की असलियत से वाकिफ होना चाहता है, और उस को मरने से पहले जीना चाहता है।  

 फिर मेरे में सवाल यह आता है कि:

- अगर आज बुद्धा आ के यह कह दे कि शून्यता आखरी कदम नहीं है, उस के आगे ओर  भी अभी बहुत कुछ है,तो?

-  अगर आज कृष्णा कह दे कि गीता मैंने नहीं कही थी, अर्जुन ने कही थी, मेरे को आतम-बोध अर्जुन से मिला है , तो ? 

- अगर जीसस  कहे कि  यह जो बाइबिल है, यह मैंने एक कहानी लिखी थी, वो कहानी ही सुपर-हिट हुई है तो ? 

- या फिर आज हम को पता चले कि मूसा ने पहाड़ी पर झाड़ी में परमेश्वर से कभी बात ही नहीं की थी, तो ?

- अगर यह भी पता चले कि बाल्मीक ने रामायण नाम की एक कहानी लिखी थी, तो? 

- अगर आज कोई आ के कहे कि  हज़रत मुहम्मद के वक़्त  'मैं' ( कोई भी ) इस्राल में था, और मैंने हज़रत मुहम्मद को देखा था, और मैं उन से मिला था और मेरे को एक किताब हज़रत मुहम्मद ने दी और कहा कि यह किताब बहुत ही अच्छी है, मेरे को एक बहुत ही नेक फ़क़ीर ने दी है , यह किताब को आप सही जगह पर पुहंचा देना, यह किताब संसार की भलाई केलिए है, तो? 

 -  हम ने कभी भी किसी को देखा ही नहीं, आज तक हम ने सब कुछ पढ़ा है या सुना है और हम ने भरोसा किया है। अगर आज हमारा सब भरोसा गलत हो जाए तो ? 

- अगर मान लो कि यह सब कुछ सच ही है पर हम देखतें हैं कि हर रोज़ सब कुछ बदलता है, सोच बदलती है, रिश्ते बदलते हैं, रिवाज़ बदलते हैं, फैशन बदलता है, वक़्त बदलता है, तो शयद जीवन की असलियत भी बदल जाती हो, तो ?

- मान लो कि धार्मिक किताबें न बदली हो और वो सच हों लेकिन चीजें बदल गईं। हो सकता है कि वास्तविकता स्थिर न रहती हो और  फिर वो असलियत अपनी प्रकृति और संरचना को भी बदल लेती हो, तो? 

= हम कैसे जानते हैं कि ऐसा नहीं है? 

= कौन कहता है कि चीजें नहीं बदलतीं? 

= कौन कहता है कि बुद्ध ने तब जो कहा, वो अब भी सच होना चाहिए?

क्या हमारे पास कोई सबूत है कि ऐसा ही होना चाहिए?

अपने भरोसों को त्यागना आसान नहीं है। पूरी तरह से अपने आप पर खड़ा होना आसान नहीं है। सब कुछ भूल जाना और सीधे खुद में खड़े हो जाना, और फिर पता लगाना कि सच क्या है?, क्या खुदा है भी या नहीं? हम क्या हैं? और  हमारी वास्तविकता क्या है? मुक्ति क्या है? आज़ादी क्या है ?असली असलियत क्या है?

इन सवालों को जानने केलिए  बहुत बड़े और गहरे हौसले की ज़रुरत होती है। 

क्योंकि हम को सभी अवधारणाओं, सभी योगों,  सभी धर्मो से,  सभी रिवाज़ों से , सभी विचारों से मुक्त होना पड़ेगा। फिर, जब हम सिर्फ हम रह जाते हैं, फिर एक यात्रा शुरू होती है।  इस यात्रा में फिर हमारे ऊपर से 'हम' की जो निति होती है, वो गिरती है तब हम भी नहीं होते, सिर्फ होतें हैं।  यह हमारा होना  खुद में होना होता है, ना ही कम और न ही ज़्यादा - बस सिर्फ होना रह जाता है।  यह वास्तविक हैं हम,  जो प्रकृति की तरह शुद्ध और सुंदर हैं, यहाँ से फिर एक यात्रा शुरू होती है, जो यात्रा हो के भी यात्रा नहीं; जो खोज हो के भी खोज नहीं; जो सिर्फ होती है-  जो खुद में ही स्रष्टि होती है।  

3 step circumambulation

 3 step circumambulation:


If we look closely at ourselves, we will understand very well that it is our- In personality we have desires, thoughts, feelings, feelings, beliefs, hopes, it is our only shield, which saves us from emptiness, because we are very afraid of emptiness.

To know what is the truth of creation, to recognize the purity of life and to embrace the beauty of myself, when my 'I' took a dip in the ocean of time, I saw a fresh smile floating on every being of the universe. has been Sitting in the lap of this newness of creation, when a mysterious unseen realization took me in its lap, my soft gaze turned towards the world. It is a model of mystery, in which the secret of the depth of the structure is hidden. So my silence became silent and told everyone that:


- Whenever you wake up in the morning - wake up as if you are just being born, and feel your birth ---

Whenever you look at your existence, look as if you love yourself immensely.

 ---Whenever you step out of your home, keep it as if your steps have started moving towards a religious place---

And these three steps will make you circumambulate your 'temple of life' -

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३ कदम की परिकर्मा:

अगर हम अपनी ओर  गौर से देखेंगे तो हम यह अच्छी तरह समझ जाएंगे कि, जो यह हमारे व्यक्तित्व में हमारी चाहना है, विचार है, भाव है, एहसास हैं, विश्वास हैं, आस है, यह हमारी एक सिर्फ ढाल है, जो हम को शून्यता से बचाती है, क्योँकि हम शून्यता से बहुत डरते हैं।   

स्रष्टि के सत्य जो जानने के लिए,  जीवन की शुद्धता को पहचानने के लिए और खुद के सौंदर्य को अपनाने के लिए,  जब मेरी 'मैं' ने वक़्त के सागर में  डुबकी लगाई तो देखा कि एक ताज़गी से भरी मुस्कान ब्रह्माण्ड की हर सत्ता  पर तैर  रही है।  स्रष्टि के इस नयेपन की आगोश में बैठी एक रहस्यमई अनदेखी प्रतीति ने जब मेरे को अपनी आगोश में लिया तो मेरी कोमल सी निगाहें संसार की ओर उठी।मैंने देखा कि संसार की रचना गहरे धार्मिक-स्थान की  है और संसार का हर हिस्सा एक ऐसे भेदभरे रहस्य का नमूना है, जिस में सरचना की गहराई का राज छुपा हुआ है। तो मेरी खामोशी ने खामोश हो के ही सब को कह दिया कि:


- जब भी सुबह उठो- ऐसे उठो जैसे आप अभी पैदा हो रहे हो, और खुद की पैदाइश को अनुभव करो ---

-- जब भी अपने अस्तित्व को देखो तो ऐसे देखो जैसे तुम स्वयं से बेइंतहा प्रेम करते हो---

 --- जब भी आप अपने घर से बाहर कदम रखते हैं तो ऐसे रखो कि जैसे आपके कदम किसी धार्मिक जगह की ओर  बढ़ने लगे हैं ---

और यह तीन कदम ही आप को आप के 'जीवन-मंदिर' की परिक्रमा करवा देंगे -

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4 Step Biography

4 Step Biography

 

1- I don't know which hand it was that knocked on the door of my sleep and woke me up so that I could enjoy this fresh morning where we learn the true meaning of leading our lives...

2- I don't know what was that moment that dominated all the 'moments' of my life and made a new era for me...

3- I don't know what was my step, which became my Parikarma The circumambulation of a sacred place) and started teaching me the lesson of perfection. 

4- I don't know what was that breath, in which was the statement of my life printed on the emptiness of the atmosphere, in which was the key to my self-field...


The experience of one's awareness is so full of mystery, when the experience is mysterious again, it fills life with a smile.

Then I saw my building (life) collapsing, the building I had erected with the little bricks of my actions; Which had been standing inside me for ages, which was now starting to crumble, which people used to know and come to see in the name of 'old historical building'. I was living suffocatingly in that building, and people used to decorate, decorate and beautify the building.

Fokey laughter in that building used to tear me down; Wrong interests made life difficult; False trust used to rob me during the day, because the guard of this building was my only false desire, which ended today and when I have become holy today, I saw that today the crowd of people has also reduced.

४ कदम की जीवनी 


व्यक्ति की जागरूकता का अनुभव बहुत ही रहस्य से भरा है, जब अनुभव फिर से रहस्यमय हो के मुस्कान से जीवन को भर देते हैं 

1- मुझे नहीं पता कि वह कौन सा हाथ था जिसने मेरी नींद के दरवाजे पर दस्तक दी और मुझे जगाया ताकि मैं इस ताजा सुबह का आनंद ले सकूं जहां हम अपने जीवन का नेतृत्व करने का सही अर्थ सीखते हैं ...

2-  पता नहीं वो कौन सा लम्हा था जो मेरे जीवन के सभी 'पलों' पर हावी हो गया और मेरे लिए नए युग का शुभ महूर्त कर दिया ... 

3- पता ही नहीं वो मेरा कौन सा कदम था, जो मेरी परिकर्मा बन कर मेरे को सम्पूर्णता  की सीख देने लगी 

4-  पता ही नहीं वो कौन सी सांस थी, जिस में वायु-मंडल के खालीपन पर छपे  मेरे जीवन का वो ब्यान था, जिस में मेरे आत्म-क्षेत्रा की कुंजी थी...  



फिर मैंने मेरी उस ईमारत ( जीवन)  को ढहते देखा, जिस ईमारत को मैंने अपने कर्मों की छोटी-छोटी ईंटों से खड़ा किया था; जो मेरे ही भीतर  युगो से बनी खड़ी थी, जो अब खड़र  होने लगी थी, जिस को लोग 'पुरानी इतिहासक इमारत'  के नाम पर जानते थे और देखने आते थे। मैं उस इमारत में घुटन से जी रही थी, और लोग उस ईमारत को सजाते थे, सवांरते थे और सुंदर बनाते थे। 

उस इमारत में फोकी हंसी मेरे को आंसू देती थी; गलत रूचि जीने को दुश्वार बनाती थी; झूठे भरोसे  मेरे को दिन में ही लूट लेते थे, क्योंकि मेरी इस ईमारत का पहरेदार मेरी ही झूठी चाहना थी, जो आज ख़तम हो गई और जब आज मैं पवित्र हुई हूँ तो मैंने देखा कि आज लोगों की भीड़ भी कम हो गई। 

Do we Know or Believe in religion?

 Do we know or believe in religion?

Accepting religion is another thing and knowing religion is another thing


Do we know or believe in religion?

If you believe, then we are passengers now. If we know then we have attained the destination, then how can we stand in the world of discrimination, how?

- Whenever the memory of Hazrat Muhammad flows in me, the love for the universe starts flowing in me, then I think that-

How then does discrimination flow among people when they say 'Eid Mubarak' every year - how?


-- Whenever I look at Krishna with love, not only my eyes, but my very existence starts flowing. Then the question becomes the person in me that -

 How can hatred of words arise in someone's tongue - in which there is warmth of love, how?


--- Whenever my head bows down to Baba Nanak, all my demerits start to fall, then a thought emerges from the spreading fragrance of my waning demerits that -

How can someone's neck be raised again, when that neck bows before love, how?


---- When my experiences start romancing with all the creations, the celebration of belonging begins in every drop of my blood. Then how will I not send an invitation to every devotee, mystic, prophet and sages, how not?

Garland of Priceless Experiences

Garland of Priceless Experiences





Not only a garland of priceless experiences, it is also a garland of words, as if nature has become involved in making me beautiful.



When a soft leaf of flowers falling from the tree touched my feet with the support of the wind, a drop of tear reflected from the moisture of my eyes became the 'funeral' of that leaf. This feeling of love for both of us became the path of self-realization.
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जब पेड़ से गिरती फूलों की एक कोमल सी पत्ती ने हवा के सहारा मेरे पैरों को छूहा तो मेरी आँखों की नमि में से झलकती आंसू की बूँद उस पत्ती का 'अंतिम-संस्कार' बन गई। हम दोनों की यह छोह की अनुभति आतम-बोध का मार्ग बन गई।
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I am small, I have a delicate shedding. I know neither any thought nor any feeling. I don't even know where to go. My feeling has taken hold of my thinking. When I was just a drop of moisture in my eyes - from that time I had learned to flow. No matter what the situation or the situation, now there is no hindrance in my heart because I have come to know that flowing is my nature.

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मैं छोटी  सी हूँ, मेरा नाज़ुक बहा  है।  न ही मैं किसी सोच को जानती हूँ और ना ही किसी भावना को।  मैंने कहाँ पर जाना है- यह भी नहीं जानती।   मेरी भावना ने मेरी सोच का हाथ ज़ोर से पकड़ा है।  जब मैं एक छोटी सी आँखों में नमी की बूँद थी - उस वक़्त से ही मैंने बहना सीख लिया था।  हालात कुछ भी हो या हालत कोई भी हो, अब मेरे भ में कोई रुकावट नहीं आती क्योंकि मैं जान गई कि बहना मेरा स्वभाव है 

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I could not even know when the writing of my trembling hands made my feet learn to walk. This understanding came to me at that time - when this writing taught my tongue to run along with the feet.

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मेरे कांपते हुए हाथों की लिखाई ने कब मेरे पैरों को भी चलना सीखा दिया, मैं जान ही न पाई।  यह समझ मेरे को उस वक़्त आई -जब इस लिखाई ने पैरों के साथ मेरी जुबां को भी भागना सीखा दिया 

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The journey of love with time: sometimes with thought, sometimes with emotion; Sometimes with money and sometimes with God; Sometimes with circumstances and sometimes with relationships; It never ends. When my 'love-story' began with my time, my journey with time made the moment an era, and my 'I' made the particle vast for time

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वक़्त के साथ प्यार की यात्रा: कभी सोच के साथ, कभी भावना के साथ ; कभी पैसे के साथ और कभी खुदा के साथ ; कभी हालात के साथ और कभी रिश्ते के साथ ; यह कभी खत्म होती ही नहीं।  मेरी मेरे वक़्त के साथ जब  'प्यार-कहानी ' शुरू हुई तो वक़्त  के साथ मेरी यात्रा ने पल को युग बना दिया, और और मेरी 'मैं' ने वक़्त के लिए कण को विराट बना दिया 

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अनमोल अनुभवों की माला ही नहीं लफ़्ज़ों की भी माला है, ऐसे ही लगा कि जैसे कुदरत मेरे को सुंदर बनाने में सलग्न हो गई है 


Beauty of Relationship

 


I thank all of you from the heart that you all have come in my life. I feel so grateful and blessed to have such beautiful souls in my life. Seeing the kindness and blessings of all of you, my head automatically bows itself. And you all accept my Peace, Love, Light and Blessings, this is the gift I want from you.

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आप सब का मैं दिल से धन्यवाद करती हूँ कि आप सब मेरे जीवन में आये हो। मैं अपने जीवन में इतनी सुंदर आत्माएं पाकर बहुत आभारी और धन्य महसूस करती हूं। आप सभी की दयालता और धन्यता देख कर मेरा सर खुद-ब -खुद ही झुक जाता है।और आप सब मेरा शांति, प्रेम, प्रकाश और आशीर्वाद कबूल करें, यही आप से तोहफा चाहती हूँ। 

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Precious moments are those, when our heart bows its head in thanks always in remembrance of all those due to which we have got the art of living

My feet have always walked in beauty and my eyes have yet to see the orange and green autumn leaves falling. Because whenever a leaf fell, so did my arrogant feelings, when the deep autumn of sadness fell in me

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मेरे कदम सदा ही सुंदरता में चले हैं और मेरी आँखों ने अभी नारंगी और हरे रंग के पतझड़ के गिरते पत्ते देखने हैं।  क्योंकि जब भी पत्ता झड़ता है, ठीक वैसे ही मेरे घमंडी एहसास गिरे थे, जब मेरे में उदासी की गहरी पतझड़ आई थी 

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I need courage and strength. Because I have to defeat my greatest enemy. The enemy who sits inside me and destroys me.

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मेरे को हिम्मत और ताकत चाहिए।  क्योंकि मैंने अपने सब से बड़े दुश्मन को हराना है। वो दुश्मन जो मेरे ही भीतर बैठ  कर मेरे को ही बर्बाद करता है।

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अनमोल पल, वो होते हैं, 

जब हमारा दिल सदा ही उन सब की याद में रहता हुआ धन्यवाद से सर झुकाता है, 

जिन के कारण हमे जीने की कला मिली होती है  

Story: Of those lingering moments

Story: Of those lingering moments


 

The story of the moment



When I felt the stopping breath out of the stagnant thoughts,
I saw the moments getting absorbed in the moment.
Which is the best subject of life, by talking on which both the world and life should become calm.
Today the same question is swirling in me, and sleep has disappeared from my eyes.
I have always stood as a question in life, today I want to become the answer for life, whether I will be able to become the answer or not, this life itself knows.
Today when this question came to life, I started writing.
- Have you ever seen 'raining' without clouds?
- Have you ever seen 'answers' coming without question?
- Have you ever heard 'sobbing' without crying?
- Have you seen any thought becoming vomit ?
- Have you ever heard sighs of happiness?
When these questions of today happened to me, I only knew that I had descended into the deep valley of life. Here every page of the story of life passes through negative and positive.
Sometimes I would see a question being born from the womb of a moment, which would throw me in such a corner of life, as if no one has gone here till date. So again a question would have arisen in me that whether it is not the case that the path of all of us living beings is such a path, on which we have always known alone, this is the beauty of life.
When this question came, this word 'lonely' started becoming anguish in me, so I looked again from within this yearning.
Here every religion stood as a science, which had a theory of life. Many questions have arisen from the understanding of theory that when I got my identity identified with me, I became an answer and brought myself into the world, from which my journey begins today and I get out of bed and sit at the desk, began to show loyalty to the present moment
-- Written something like this: The moment blooms for those who read
-- Make the choice of words something like this: the steps of the walkers stop;
-- Say something like this: even those who do not hear can hear.
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रुकते पलों की अफ़साना


इसे पल की कहानी

ठहरते विचारों में से जब रूकती साँसों को महसूस किया 
तो उसी पल में पलों को पलों में ही लीन होते देखा 
जीवन का सब से अच्छा विषय कौन सा है,जिस पर बात करके संसार और जीवन दोनों ही शांत हो जाएँ
आज मेरे में यही सवाल घूम रहा है, और नींद मेरी आंखों में से गायब हो गई।
मैं सदा ही जीवन में सवाल बन कर खड़ी रही, आज जीवन के लिए जवाब बन जाने को दिल करता है, जवाब बन पाऊँगी कि नहीं, यह जीवन खुद में ही जानता है।
आज जब यह सवाल जीवन ले के आया तो मैं लिखने लगी।
- क्या आप ने कभी बिन बादलों के 'बरसात' होते देखी है ?
- क्या आप ने कभी बिन सवाल के ही 'जवाब' आते देखें हैं?
- क्या आप ने कभी बिन रोने के ही 'सिसकी' आती सुनी है?
- क्या आप ने किसी सोच को 'वमन ' बनते देखा है ?
- क्या आप के कभी सुख की आहें सुनी है ?
आज के यह सवाल जब मेरे साथ घटे थे तो मैंने यही जाना था कि मैंने जीवन की कितनी गहरी घाटी में उतर गई थी। यहाँ पर जीवन की कहानी का हर पन्ना नेगेटिव और पॉजिटिव के माध्यम में से गुज़रता है।
कभी एक पल के गर्भ में से एक सवाल को जन्मते देखती, जो मेरे को जीवन के एक ऐसी नुकर में जा फेंकता , यहाँ पर जैसे आज तक कोई गया ही न हो। तो मेरे में फिर सवाल पर सवाल जन्म ले लेता कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हम सब जीव का रास्ता ही एक ऐसा रास्ता है, जिस पर हम ने सदा अकेले ही जाना है, यही जीवन की सुंदरता है।
जब यह सवाल आया तो यह 'अकेला' लफ्ज़ मेरे में तड़प बनने लगा तो मैंने इस तड़प के भीतर में से फिर झांका।
यहाँ पर हर धर्म एक विज्ञान बन कर खड़ा था, जिस के पास जीवन की एक थिओरी थी। थ्योरी की समझ में से अनेक सवालों ने पैदा हो के मेरी पहचान मेरे से जब करवाई तो मैं एक जवाब बन कर खुद को संसार में ले आई , जिस से मेरी आज की यात्रा शुरू होती है और मैं बिस्तरे से उठ कर डेस्क पर बैठ के, माजूदा पल के साथ वफ़ा निभाने लगी
-- लिखा कुछ ऐसा: पल खिल जाए पढ़ने वालों के;
-- शब्दों का चनाव करा कुछ ऐसा : चलने वालों के कदम रुक जाएँ;
-- बोलें कुछ ऐसा: न सुनने वाले भी सुन पाएं
 
 
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Christ's first smile

It was Christmas day and I was looking at Christmas decorations standing in a very beautiful mall in New York, seeing which my existence was meditated. The feeling of this decoration deep within me gave me a state of very deep silence, and I saw for the first time that 'Jusus' was standing in front of me. I swung my head 8-9 vigorously, but the picture of 'Jusus' that was in front of my eyes remained the same. The energy of my existence had accelerated tremendously, and my heart began to quiver and vomit, feeling cold as if the temperature had risen extremely high.
I went outside the mall and sat down at one place. I closed my eyes, after a while my existence came to the right place, and after that there was a flavor in the health of my existence, which was very strange and intoxicating, which was giving me a very deep understanding that-
'When the channel of existence is in the right place, then the universe is within the existence'
Even if I say that it was my imagination, I thank God that God has given me such a fantasy.
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ईशा-मसीह की पहली मुस्कान

क्रिसमस के दिन थे और मैं न्यूयोर्क के एक बहुत ही सूंदर मॉल में खड़ी क्रिसमस की सजावट देख रही थी, जिस को देख कर मेरा वजूद मेडिटेट हो गया था। मेरे भीतर की गहराई में इस सजावट का एहसास मेरे को बहुत ही गहरी चुप की अवस्था दे गया, और मैंने पहली वार ऐसा देखा था कि जैसे मेरे ही आगे 'Jusus' खड़े ने। मैंने अपने सर को ८-९ वार तेज़ी से झड़का , पर 'Jusus' की जो तस्वीर मेरी आँखों के आगे थी, वो वैसी की वैसी ही रही। मेरे वजूद की ऊर्जा की गति बहुत ही भारी मात्रा में बढ़ चुक्की थी, और मेरे दिल मचलने लगा और वोमिट होने लगी , ठंडी ऐसे लगने लगी कि जैसे बहुत ही ज़्यादा तापमान बढ़ गया।
मैं माल के बाहर जा कर एक जगह पर बैठ गई। आँखों को बंद किया , थोड़ी देर के बाद मेरा वजूद सही जगह पर आया, और उस के बाद मेरे वजूद की तंदरुस्ती में एक खाश्बो थी, जो बहुत ही निराली और मदहोशी भरी थी, जो मेरे को बहुत गहरी सोझी दे रही थी कि-
'वजूद का चैनल जब सही जगह पर होता है तो बर्ह्माण्ड ही वजूद के भीतर होता है'
अगर मैं यह कह दूँ कि यह मेरी कल्पना थी, तो भी मैं खुदा को धन्यबाद देती हूँ कि खुदा ने मेरे को ऐसी कल्पना से नवाज़ा

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When energy is active, then

Today's Experience:
A person becoming enlightened means that the expressive side of the energy has become active and being filled with love means that the receptive side of the energy has become active. The expressive side becoming active means that the male quality of energy has been awakened and the receptive one becomes active, that means the female quality has become active.

When the union of knowledge and love becomes a blessing that is integrated into the individual consciousness, then the individual is the master of ideas and unfolds under the original creative law.
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जब ऊर्जा क्रियाशील होती है, तब

आज का अनुभव :
व्यक्ति का ज्ञानवान हो जाने का मतलब है कि ऊर्जा का अभिव्यंजक पक्ष एक्टिव हो गया है है और प्रेम से भर जाने का मतलब है कि ऊर्जा का ग्रहणशील पक्ष एक्टिव हो गया है। अभिव्यंजक पक्ष का एक्टिव हो जाना कि ऊर्जा का पुरष गुण जाग गया है और ग्रहणशील का एक्टिव हो जाना, मतलब स्त्री गुण एक्टिव हो गया है।
जब ज्ञान और प्रेम के मिलन आशीर्वाद बन जाता है तो व्यक्तिगत चेतना में एकीकृत हो जाते हैं, तो व्यक्ति विचारों का स्वामी होता है और मूल रचनात्मक कानून के तहत सामने आता है

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Take a Walk with me (spiritual walk)

Take a Walk with me 


 If I close my eyes, I can see a smile smiling through the tingling of my half-open eyelids. And when I open my closed eyes, I get a mischievous and luscious feeling that emerges from every moment in my surroundings.

 In my silent mind, the sound of deep music flows out of my mind, to the beat of the quiet.

The relationship between silence and smile:

The relation of rhythm with a Amazement heart:

A stream of silence flowing from my silent eyes, which was getting deeper every moment.

 When the solitude of my silence touched the stars, the waves of my own smile started flying in the sky within me.

Then the mischief of a smile flowing from a moment, sitting in the lap of my silence, looking at me, said,

 'Aren't we both enough for you?'

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अगर मैं अपनी आँखें बंद करती हूँ तो मुझ को मेरी आधी-खुली पलकों की झनझनाहट में से एक मुस्कान मुस्कराती हुई दिखाई देती है। और  जब मैं अपनी इस बंद आखों को खोलती हूँ तो मेरे को मेरी हर तरफ के वातावरण में हर पल में से उभरने वाली एक शरारती  और मदहोशी में लिपटी हुई अनुभूति मिलती है। 

 मेरे खामोश मन में से आराम से बहती चुप के सुरों की ताल पर, मेरे जिसम में से गहरे संगीत की आवाज़ आती है। 

चुप और मुस्कान का नाता :

मदहोशी भरे दिल से ताल का नाता :

मेरी खामोश नज़र में से बहती खामोशी की धारा , जो हर पल ओर  भी गहरी होती जा रही थी। 

 जब मेरी खामोशी की तन्हाई की तारों को छूते , मेरी ही मुस्कान की तरंगें ,

 मेरे ही भीतर के आसमान में उड़ने लगे। 

तब एक पल में से बहती हुई मुस्कान की शरारत ने मेरी चुप की आगोश में बैठ कर, मेरे को देख कर कहा कि,

 'क्या हम दोनों आप के लिए काफी नहीं हैं?' 


Everyday, new incidents happening every moment and the twilight of fresh experiences telling the secrets of life


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I learned that life is activated by love, so I started taking care of love. Just as the crop grows, love started growing on the land of my heart and the smell of the blossoming flower of love made me feel such happiness that I went from house to house and started making people's hearts my own. Today it has become my karma that I can grow the crop of love.

For a beautiful life-journey!

* Be the giver of love!

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 मैंने जान लिया के जीवन प्यार से ही एक्टिव होता है, तो मैंने प्यार की देखभाल करनी शुरू कर दी।  जैसे फसल उगती है, ठीक वैसे ही मेरे दिल की ज़मीन पर प्यार उगने लगा और  प्यार के खिलते फूल की महक ने मेरे को ऐसे सुख का एहसास दिलवाया कि  मैंने घर घर जा कर लोगों के दिल को अपना बनाना शुरू किया। आज मेरा यही कर्मा बन गया कि मैं प्यार की फसल को उगा सकूं। 

एक सुंदर जीवन-यात्रा के लिए!

*प्यार के दाता बनो!


हर रोज़, हर पल घटते नए हादसे और जीवन के राज बताते ताज़े अनुभवों की सांझ 

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Today my life is engaged in the journey of 'Moment' and works to see every thought and every emotion flowing through the moment. I did not even know when this wonderful life started narrating the sound of this wonderful dimension. I came to know at that time, when I looked behind the sound coming from the moment of silence, there my existence used to sing on the melody of 'Wow' and my heart used to play 'Aha' on the melody of 'Wow'.

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आज मेरा जीवन 'पल' की यात्रा करने में ही सलग्न है और पल में से बहती हर सोच और हर भावना को देखने का काम करता है। यह मेरा अद्भुत जीवन कब अद्भुत आयाम की ध्वनि सुनाने लगा , मेरे को पता ही न चला।  मेरे को पता उस वक़्त लगा ,जब मैंने चुप के पल में से आती ध्वनि के पीछे देखा तो वहां पर मेरा वजूद 'वाओ'  का राग पर गीत गाता था और मेरा दिल 'वाओ'  के राग पर  'आहा' का साज बजाता था। 

No difference between Age zone and Womb zone

No difference between Age zone and Womb zone



Have you ever thought so?
The world is the 'Age-zone', here we live in the womb of age and when we are born in another dimension, we say that we have died, perhaps in the same way when the child is born from the mother's womb, then the germ of the 'Womb -zone' would say that the child is dead

What is LIFE? What is DEATH? AS you can see, this is a fresh, tender leaf, and it is gradually unfolding itself in the sunlight. What is born undergoes death also. What takes birth, and what is it that dies? We have no idea why we are born and why we even die? How can we expect to know death when we are clueless about our birth? We have not seen ourselves coming into this world (birth), nor have we witnessed ourselves exit it (death). Could it be that both birth and death are the same processes?
We are experiencing every part of life in common in everyday life, when we look closely, then every chapter of the universe will be found open.
They are both the same, and the feeling and experiences are also the same. The cycle of birth and death is a continuum. It takes nine months for the baby in the mother's womb to grow before taking birth. Could it be that when we live for seventy, eighty, or even ninety years - we are in the same process of developing just like the baby in the womb grows until it is ready to take birth? Could it be that when we die, it is not death as such but rather taking a birth elsewhere just like a newborn baby?
Perhaps LIFE itself is a womb through which we traverse and grow only to take birth elsewhere? So essentially, what seems to us as death is not death but a new beginning in a new realm altogether. When you arise in the morning, Chetna (Consciousness) wakes up eight seconds before - this is worthy of highlighting and underlining because, in due course, I will discuss it in great depth. We then wake up and open up our eyes, be it in the next two or even ten minutes or beyond. We casually lie in bed before jumping or getting out of it.

In the morning, I created a twenty-five minutes video on Dilip Kumar's demise. I am in bed with folded hands saying my prayers, and that very instant, my Consciousness snaps with a sharp jerk, just like jerking and snapping wet cloth in the air. It tells me that what is happening is meant to happen for the good of all! Both good and evil are advantageous for us in life.
A baby grows in the mother's womb, and then it is born into this world. In life, we too undergo growth, but the question is, what then takes birth? Could it be that what we call birth is nothing but death? When we are born, our parents and kith and kin celebrate our arrival in this world - but could this be our death? In the womb of Samsara, what is it that grows and takes birth by transiting into the next world?
What is it that may get left behind in the mother's womb when we have fully grown and ready to take birth in this world? The fact that we are born signifies that we leave the remnants of our seed feelings (embryonic germ pattern and imprint) behind in our mother's womb - what is this seed form or the sense of feeling left behind? When we enter the realm of death (physical death as we know it), and we get ready to be born by transiting into the next world, what is the seed feeling (germ humanoid pattern or energetic form and imprint) that gets left behind? These are questions worth pondering!
What is this life-death energy flux or pattern? When we walk forward, we have no time to look back, let alone see our footprints left behind us. We think and believe that we are moving forward, but could it not be possible that LIFE precedes us and it is behind us? By walking ahead, we could well be creating LIFE behind us - would that not be a possibility?
I felt like journeying with death this morning. In meditative silence, I saw myself traveling through galaxies while lying in bed. While traversing, I end up in a sphere of space of death energy (aura). However, this death energy field was not as overpowering as that of Michael Jackson's death aura! I have also seen my father's death aura. While I was in this sphere of death energy, I was aware that the person has only just entered the death realm energy field in the last seven minutes - in other words, the person has met death seven minutes before. I was unsure who has died, but all I know is that the aura manifests from the Atmic field only for a fact!

The greater our AWARENESS, the more powerful our AURA will be. I have a very close association with DEATH. For example, if I am in a household where somebody's death is inevitable, then I would pick up the dark energy at once! If we do NOT know LIFE energy, how are we to know DEATH energy at all? How are we to recognize DEATH energy?
You may raise a question, 'If you have picked up the energy of DEATH in deep SILENCE, why could you not specifically tell whose death has taken place or who has died? This a valid question by all means and one of great importance. Never trust anyone blindly. If you place trust in anyone, make sure it is complete with absolute faith - otherwise, keep away. If your trust turns into a shade of doubt, it can be dangerous.
Understanding one's AURA or energy form only occurs via an energy field (of another person, as is the case with my experience today). For example, if Paresh says, 'Maa, how am I feeling today?' To recognize and understand Paresh's vibes, thoughts, and feelings means that I will have to establish myself in my very own energy field - only then will I recognize Paresh's energy vibes and not otherwise! Only energy will recognize energy, and this is a rule of thumb.
What is science - supreme knowledge? We know that 2+2=4. If we want to know and recognize God, then we will have to become like GOD. We will have to live purely from the ATMIC (Soul) level only. To understand somebody's feelings, we have to establish ourselves on the MAANSIK (mind) platform. To recognize someone's LOVE, we will have to place ourselves in the HEART region. To understand someone's mental capacity and intellectual prowess, we will have to work from the BHODIK level.
The space below ATMA (SOUL) denotes shape, color, and size. These three qualities have subdimensions - where there is a seed form, and above this is the PURE ENERGY or LIGHT form. The latter LIGHT level is from where we take BIRTH.
What is the embryonic germ pattern left behind in the mother's womb that we have no idea about yet? Science may fathom this in the next hundred years post my death. The level at which I am communicating my thoughts right now is beyond the platform of Brahman. You may have noticed as I speak, there is a burst of energy in my tone, and my body is full of energy. I have the camera in my hand, and I can feel the power of energy (just like a current) running through my body and the arm.

I am sweating right now because my body is feeling hot due to the powerful energy currents in my body. I mentioned in the short video this morning with regards to the demise of Dilip Kumar the Bollywood actor, that I will discuss in-depth the energy patterns as discussed above in my forthcoming video in detail.
I wish to make a documentary on this subject, and I am looking for a team of scientists specializing in this field of studies. I want to work with a team researching energy medicine (EM), with whom I can share my experiences to date. I am looking for persons specializing in computer programming and technology, animation, and simulation. I also want to create a video, and I asked Ravi - that I want to learn computer programming, but I will be wasting my time as I wish to concentrate on my work.
If I cannot accomplish these goals in this LIFE, then so be it. I will do so in the next life, but I will make sure that it gets fulfilled! I was eager to find out the composition of the baby growing in the mother's womb. I wanted to understand what happens to the baby as it grows and what happens to the SOUL? The SOUL cannot remain encased or bound in the womb - it MUST be journeying beyond this realm? This experience somehow coincides with the event I encountered this morning.
Do we have no understanding of how we can see things in life? How can the physical eyes see near and far? How does light allow us to see things in life? What is the source of light? People will frown at what I have shared today concerning my seeing and journeying into someone's energy space post their demise. Who is prepared to believe what I am saying today? Post my death, when science discusses what I am saying, then and only then, perhaps people will believe what I am sharing right now but not otherwise.
Religious affiliations will find it hard to trust and believe what I am sharing - yet I am confident that the scientific arena and people who work in science and technology will comprehend and accept my thoughts and proposition. The scientific world will understand and acknowledge my work and appreciation of the energy field.

I am confident that the younger generation interested in computerized gaming will acknowledge my work. Today's Dharma can be found and accessed via a plastic metal contrivance called a computer, smartphone, and accessories, etc. In this day and age, we can attain NIRVANA via SCIENCE. We can become Sages and Saints alike, including Rishis, and Munis, via technology alone. Science has always regarded SPACE or ETHER as its substratum or benchmark from which it has developed by making incredible advances unparalleled.
Nothing is lost, nothing is created, everything is transformed.
Similarly, energy is neither created nor destroyed - it is converted from one form of energy to another. The subject discussed can only be appreciated through the amalgamation of science and Consciousness (Chetna or ATMA). I repeat - I will discuss this through a documentary very shortly.
Translated By Paresh JivanJi

जीवन के हर हिस्से को हम रोज़-मरा के जीवन में आम ही अनुभव कर रहे हैं, जब हम ने ज़रा ग़ौर से देखा तो सृष्टि का हर चैप्टर खुला ही मिलेगा 


क्या आप ने कभी ऐसा सोचा है? संसार आयु-मंडल है, यहाँ पर हम आयु के गर्भ में रह कर के एक ओर आयाम में जब जन्म लेते हैं तो हम कहते हैं कि हम मर गए, शयद ऐसे ही माँ के गर्भ में से जब बच्चा जन्मता है तो गर्भ का कीटाणु मंडल कहता होगा कि बच्चा मर गया

रेतली राह का मुसाफ़िर

रेतली राह का मुसाफ़िर
माननीय प्यार , आज मैं खुद को आप के आगे सन्मानित करना चाहती हूँ कि मैं आप की रचना हूँ ; और खुदा के आगे मैं खुद को धन्यवाद का उपहार देना चाहती हूँ कि 'धन्यवाद शहीर ' कि आप ने खुदा से प्यार किया। हर किर्या के लिए धन्यवाद
The best cure of the body is a quite mind:. Powered by Blogger.