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My Profession is to always find God in Nature

My Profession is to always find God in Nature
What I knew was that the silence blossomed the heart. When the heart blossomed, there was a feeling of love. The romance started with me. When my romantic-mind took all my stress from me all the time, I could not know. I who I am, I am unknown, today I remembered Buddha in unknown happiness

 Such a precious event that only converts, we cannot call it death.

Emptiness and death
The feeling of emptiness is so deep that there is no difference between death and emptiness. I am in death or in emptiness, the experience of both is the same. There is a lot of difference between deep silence and emptiness, as deep as silent, looking at the silence in it, a core of existence always shouts. This does not happen in emptiness. Emptiness is just emptiness. Emptiness is like a dream, when one awakens, it is realized that it was a dream. In the same way, when we get out of emptiness, then there is a feeling of emptiness.
There is also a difference in both. In a dream, we are not conscious of ourselves, but in emptiness we know our existence - this consciousness is such that we are in this - but we cannot say that I am, because in emptiness the mind does not happen. The mind is in the dream, but the mind cannot go into emptiness. Emptiness comes in us only when we are crossed with the mind.
Far away, away from the sky, away from the clouds, the distance of which cannot be measured. Today I am not an experience of this emptiness, but an experiment.
first question :
How can we see the area of ​​such vast and infinite emptiness?
Consciously
From the spiritual realm
Let me tell you one more thing that when we are at spiritual level, sometimes there are such moments that we are also aware of our body, and also go into the spiritual realm.
When I had this experience, I knew and believed that people tell the truth that dead saints can come back, and people have seen them.
What is the meaning of conscious-form?
The real form, the real one that exists in us, is light, understanding, consciousness.
Light that makes sense
Light is the real form of intelligence
 What is our Wisdom, what is its shape - it is like light
If this thing is understood then the joy will start coming not only from life but from the universe itself.
Then we will never be able to say that I belong to this country and I belong to this religion, all discrimination ceases.
Wow!
When any person is at the level of consciousness, then that person sees the whole universe in a moment. To what extent consciousness is awakened, it all depends on it. Right now I do not know how far the depth of my consciousness has awakened, but I know what I can see and experience - from this we can guess something.
When we look at the sky, the blue color becomes our limit. There is no limit in emptiness, depth is there. We know from somewhere that this emptiness is deepest, not the end of it. This experience can be made very good in the film, or as you are sitting in front of me, I can tell you to walk and rotate in the same way. How our senses work.
I am standing in a place like, but my eyes are very big and deep - there is no substance in front of it. My eyes also rip off the substance. Meaning that nothing is hidden.
Emptiness: This is such an area - in which everyone is aware, everyone has presence but not everyone. I feel that I am who I am. As if all my world, all life, everything, what I saw, what I heard, good or bad, everything, it was me.
Like I am able to write this experience with all of you today, I think that I am able to share it with all of you but it is not like that.
Such as: I have not been able to see it, it is such a belief - I am seeing that I am writing and you will think that you are studying. But all this is not happening anywhere - we feel it. What we feel - that we are doing all this, our consciousness has revealed itself - that we are writing and studying all this, it is in me and in you. I am writing it and you are reading it. If as soon as you read, deep silence came in you, one of the deepest silent became Basoch Tannal, took your attention to that point of silence - this is what you are studying here - living there in the same detail If you and my consciousness have become one, then it is called 'Soul-twins'.
We are asleep in dreams and awake in emptiness. When we are shadowed, we see that the world is everywhere. When we are in emptiness then only we are.
We can also say this that we are a world in ourselves. The world is no other, I am the world. Just as there are millions of germs in the body, similarly we are all germs. Of which? Of consciousness.
Now I see a very deep death in this emptiness.
Why does the feeling of death appear?
 When everything is empty then why is the feeling of death there and why is it feeling to me?
Why?
Emptiness is also a part of life. We also feel emptiness in our daily lives.
 Whatever we all feel in our lives, it is just a shadow. Meaning that it is only 1% of a truth - we have to go through 99% right now.
The feeling of death in emptiness is that a lot is yet to die.
Emptiness is such a dimension - one whose nature is completely silent, and whose beauty is to unify everyone. Whether it is death or life
We see ourselves how we are changing, sometimes solid, 
sometimes liquid and sometimes light. 
Why would we not want to see such an ancient?
 How shall we not love such an ancient?
  Such a precious ancient which only converts, we cannot call it death. 
Death is the only word that does not exist, 
which is just a rainbow - nothing else

***—***

खालीपन और मौत

खालीपन का एहसास इतना गहरा कि मौत और खालीपन में कोई फ़र्क़ नहीं। मैं मौत में हूँ या खालीपन में, दोनों का अनुभव एक जैसा ही है। गहरी चुप और खालीपन में बहुत फ़र्क़ है, चुप जितनी भी गहरी हो, उस में चुप को देख रही वजूद की एक कोर सदा अपनी आहट देती है।  खालीपन में ऐसा नहीं होता।  खालीपन सिर्फ खालीपन है।  खालीपन सपने की तरह है,जब जाग जातें हैं, तब पता चलता है कि यह सपना था। वैसे ही खालीपन से जब  हम बाहर निकलते हैं, तब खालीपन का अहसास होता है।
दोनों में एक फ़र्क़ ओर भी है। सपने में हम को अपने आप की बिलकुल होश नहीं होती, पर खालीपन में हम को अपने वजूद का पता होता है - यह होश ऐसा होता है कि इस में हम होतें हैं -पर यह  हम नहीं कह सकते कि मैं हूँ,  क्योंकि खालीपन में मन नहीं होता। सपने में मन  साथ होता है  पर खालीपन में मन जा ही नहीं सकता। खालीपन हमारे में आता ही तब है,जब हम मन से पार हो जातें हैं।
दूर बहुत दूर ,आसमान से दूर, बादलों से दूर, जिस की दूरी को मापा नहीं जा सकता। आज मैं इस खालीपन का अनुभव नहीं, एक एक्सपेरिमेंट हूँ।
पहला सवाल :
हम कैसे इतने विराट और असीम खालीपन के खेत्र को देख सकतें हैं ?
चेतन-रूप से
आत्मिक खेत्र से
आप को एक बात और कहूँ, कि जब हम आत्मिक लेवल पर होतें हैं तो कभी कभी ऐसे पल भी आतें हैं कि हम अपने जिस्म के प्रति भी सुचेत होतें हैं, और साथ ही आत्मिक खेत्र में चले जातें हैं।
जब मेरे को यह अनुभव हुआ तो मैंने उस वक़्त जाना और भरोसा किया कि लोग सच कहतें हैं कि मरे हुए संत वापस आ सकतें हैं, और लोगों ने उन को देखा है।
चेतन-रूप का मतलब क्या है?
असली रूप, जो असली हमारा वजूद है , वो रौशनी है , समझ है , होश है।
ऐसी लाइट जिस में समझदारी हो
समझदारी का असली रूप रौशनी है
 जो हमारी विजडम है, उस का जो आकार है - वो रौशनी जैसा है
अगर यह बात समझ में आ गई तो ज़िंदगी से ही नहीं, ब्रह्माण्ड से ही आनंद आने लगेगा।
फिर हम कभी यह नहीं कह पाएंगे कि मैं इस मुल्क का हूँ और  मैं इस धर्म का हूँ , सब भेद-भाव ख़त्म हो जाता है।
वाओ!
जब कोई भी व्यक्ति चेतना के तल पर होता है तो वो व्यक्ति पूरे ब्रह्माण्ड को पल में ही देख लेता है। चेतना किस गहराई तक जागी है, इस पर  ही सब निर्भर करता है। अभी मेरे को यह तो पता नहीं कि मेरी चेतना की गहराई कहाँ तक जागी है पर यह पता है कि मेरे को क्या दिखाई देता है और क्या  अनुभव होता है - इस से हम कुछ न कुछ अंदाज़ा लगा सकतें हैं।  
जब हम आसमान की ओर देखतें हैं तो नीला रंग हमारी हद बन जाता है।खालीपन में हद नहीं होती, गहराई होती है। हम कहीं से यह जानतें हैं कि यह खालीपन गहरे से गहरा है ,इस का अंत नहीं है। इस अनुभव को फिल्म में बहुत अच्छा बनाया जा सकता है , या जैसे आप मेरे आगे बैठे हो, मैं आप को वैसे ही चलके और वैसे ही घूमते घुमते बता सकती हूँ। कैसे हमारा होश काम करता है।  
मैं एक जगह पर खड़ी हूँ जैसे, पर मेरी नज़र बहुत बड़ी और गहरी है- इस के आगे कोई भी पदार्थ नहीं है। मेरी नज़र पदार्थ को भी चीर देती है।  मतलब कि कुछ भी छुपा हुआ नहीं है। 
खालीपन : यह एक ऐसा खेत्र है -जिस में सब का आभास है, सब की प्रजेंस है पर सब है नहीं।मेरे को ऐसे लगता है कि जो यह सब है ,वो मैं ही हूँ। जैसे कि मेरा सब संसार, सब ज़िंदगी, सब कुछ ,जो देखा ,जो सुना, अच्छा हो या बूरा , सब कुछ , वो मैं ही थी। 
जैसे कि आज जो मैं आप सब के साथ यह अनुभव ही लिख कर सांझ पा रही हूँ , मैं यह सोचती हूँ कि मैं आप सब के साथ यह सांझ पा रही हूँ पर यह ऐसा कुछ है ही नहीं। 
जैसे: मैं सांझ पा ही नहीं रही, यह एक ऐसी प्रतीति है - मैं देख रही हूँ कि मैं लिख रही हूँ और आप सोचोगे कि आप पढ़ रहे हो।  पर यह सब कहीं पर भी हो नहीं रहा -हम को लग रहा है।  जो यह हम को लग रहा है - कि हम यह सब कर रहें हैं , यह हमारी चेतना ने खुद को प्रगट किया है - जो हम यह सब लिख रहें हैं और पढ़ रहें हैं ,यह मेरे में है और आप में हैं।   मैं उस को लिख रही हूँ और आप उस को पढ़ रहें हो। अगर पढ़ते पढ़ते ही आप में गहरी चुप आ गई , गहरी चुप में से एक सोच टन्नल बन के, आप के ध्यान को चुप के उस बिंदु पर ले गई -यहाँ पर यह जो पढ़ रहे हो- वहां पर यही वस्तार में  जी रहा है तो आप की और मेरी चेतना एक हो गई तो इस को कहतें हैं 'सोल-टविन' . 
हम सपने में सोये हुए होतें हैं और खालीपन में जागे हुए होतें हैं।  जब हम साये हुए होतें हैं तो हम देखतें हैं कि हर तरफ संसार है।  जब हम खालीपन में होतें हैं तो सिर्फ हम ही होतें हैं। 
इस को हम ऐसे भी कह सकतें हैं कि हम अपने आप में संसार होतें हैं। संसार कोई ओर नहीं, मैं ही संसार हूँ। जैसे जिस्म में लाखों कीटाणु होतें हैं, वैसे ही हम सब कीटाणु हैं।  किस के ? चेतना के। 
अब इस खालीपन में मेरे को बहुत गहरी मौत भी दिखाई देती है
मौत का अहसास क्यों दिखाई देता है ? 
 जब सब कुछ खालीपन ही है तो मौत की भावना  वहां पर क्यों है और मेरे को यह क्यों अपना अहसास दे रही है ? 
क्यों?
खालीपन भी ज़िंदगी का ही हिस्सा है।  हम अपनी रोज़-मरा की ज़िंदगी में भी खालीपन महसूस करतें हैं। 
 जो भी हम सब अपनी अपनी ज़िंदगी में महसूस करतें हैं, वो सिर्फ परछाईं है।  मतलब कि यह किसी  सच का १% ही हिस्सा है - अभी हम ने 99% में से गुज़रना है।
खालीपन में मौत का अहसास यही है कि अभी बहुत कुछ मरना बाकी है।  
खालीपन एक ऐसा  डायमेंशन है - जिस का सुभाव खाली चुप है, 
और जिस का सुभाव सब को एक कर देना है।
  चाहे वो मौत है या ज़िंदगी  
हम खुद को देखतें हैं कि हम कैसे बदल रहें हैं, कभी ठोस, कभी तरल और कभी लाइट। 
 ऐसी घटना को हम क्यों नहीं देखना चाहेंगे ?
 ऐसी घटना से हम प्यार कैसे नहीं करेंगे ?
 ऐसी अनमोल घटना जो सिर्फ कन्वर्ट करती है, इस को हम मौत नहीं कह सकते। 
मौत ही एक ऐसा लफ्ज़ है, जिस का कोई वजूद नहीं, 
जो सिर्फ रेनबो है -और कुछ भी नहीं 
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