Do you know that we are a big miracle secret?

Do you know that we are a big miracle secret?
Following the trail of colorful emotions and beautiful divine relationships. Now life Blossoms, beginning to love because it is a vibrant land of love and a beautiful feelings to wander across the heart during the journey of awakening. But here are some of the most stunning moments to witness life in full bloom with divine relationship and divine action like spring...And now thoughts are in bloom

positive suicide

Do you know about positive suicide?

Natural and non-natural deaths:
Who do we consider to be a non-natural death?
When a Soul Murders?
When someone is killed?
Why, we think that this death is not natural?
Whenever the time comes to take any action before us, if we get two paths ahead of that, but we follow the same path, due to which we reach that point. But we also have a way to end such an event - be it natural or non-natural. Meaning that the event which we can give a new twist, but not given, that event is non-natural, whatever happens. Such incidents happen 90% in our lives.
If we are stopped at the point, which has no way except to go forward, we cannot go back, because we are trapped in such a cave that there are stones falling on the back path and forward. If there is no way, then this condition is natural.
90% of our lives are non-natural. Self-murder could not be natural at that time, if there was no other way for the person who died.

Like someone killed someone in anger. The fault of both is equal. If both have come to the point that one had to die then it is not natural. How many occasions must have come in front of the person who was killed, so that they do not cause the anger of the other, but did not stop. The killer also had another chance at the last point that one could change his path but not change, it became a non-natural phenomenon. The self-murderer also had the last choice, but if one did not stop, self-murder also became non-natural.

We all have many opportunities to change our lives, but we have to live in stress, pain, depression, our life is all non-natural, then there will be pain.
Step by step, we get a chance that we can go to east or west. We have known in the temple or in the market. We have to drink water soda. We have to watch a movie or listen to satsang. Have we ever wondered why we are not getting happiness in our life?
If there are miseries in our life, then we are living in a non-natural way, if we are happy then we are living in a natural way.
To erase body is death, but to drown the soul in pain is deep self-murder.
Question is:
When I Have No Choice To Be. My heart does not want to live, if I accept death, under what condition am I taking this step, you will never understand. When I am living, then there is no courage among all of you, to support me, if I choose death, will you shed your righteousness like a shroud on my death?

We all do non-natural feats step by step. All this disease is the result of our non-natural life.
If my soul is dead then what is the value of the body? Body is clay according to all your religions. If the Body is the soil, then the price of the soil increases, when someone commits self-murder?
When we deal with the poverty of the poor in the name of religion, then there is no cost to soul. Well, for us, the soul is the abode of God.
When we show our power in the name of votes, and we take the wrong benefits of the lives of the people, is not this murder?
Break the heart, rob the desire to live, isn't  one's murder?
We all rob each other step by step, do not even consider the other to be human, then, do we not kill the heart, is it not unnatural that we have eradicated the zest of living from anyone?
When someone has committed suicide, how do we become the contractors of religion and society, there is no shame in us?
Whoever committed suicide, one is not guilty, we are guilty, we will be punished.

As life has shown me and explained to me, according to that I say
- Whenever anyone commits self-murder, we all are guilty, we all have forced that person to take this step. Whether we know it or not.
- If any thief is born somewhere, we all have made one a thief, knowingly and unknowingly.
- If a sage is born somewhere, we are all behind one's birth, knowingly and unknowingly.
God is one
The world is one
We are all one
It would be natural if we believed
If we don't believe we are non-natural
If we cannot see everyone in harmony, then whatever we do, it will be non-natural. Then how can we expect a happy and comfort life?
Now a question has come in my mind, then take this question with you and answer this question yourself secretly.
I thought that death is only natural to sages, and no one can, then

When this thought came to my heart, then I remembered the description of the death of the sages from history, so the question put its question on the mind.

be happy

आत्म-हत्या दो किस्म की होती है ; 
पॉजिटिव भी नेगेटिव भी 
अगर आत्म-हत्या की बात ज़िंदगी में आ ही गई 
तो चलो हम पॉजिटिव आत्महत्या ही करतें हैं 

कुदरती और गैर-कुदरती मौत:
हम ग़ैर-कुदरती मौत किस को मानते हैं ?
जब कोई आत्मा हत्या करता है ?
जब किसी का क़त्ल हो जाता है ?
क्यों, हम यह सोचतें हैं कि यह मौत कुदरती नहीं है ?
जब भी हमारे आगे कोई भी एक्शन लेने का वक़्त आता है, अगर उस के आगे हम को दो रास्तें मिलते हैं, पर हम वोही रास्ता अपनातें हैं ,जिस के कारण हम उस पॉइंट पर पह्नुचें। परन्तु हमारे पास ऐसी घटना को ख़तम करने के लिए एक ओर भी राह होती है - वो घटना कोई भी हो कुदरती हो या गैर-कुदरती, कोई भी हो। मतलब कि जिस घटना को हम नया मोड़ दे सकतें हैं, पर दिया नहीं, वो घटना गैर-कुदरती ही है , कोई भी घटना हो। ऐसी घटनाएं हमारी ज़िंदगी में 90% होती हैं।
अगर हम उस पॉइंट पर आ के रुकें हुए हैं , जिस के आगे जाने के सिवा ओर कोई भी रास्ता नहीं होता, पीछे हम जा नहीं सकते, क्योंकि हम ऐसी गुफ़ा में फसे होतें हैं कि पीछे के रास्ते पर भी पत्थर गिर चुक्के हैं और आगे कोई भी राह नहीं है तो यह जो हालत है , यह है कुदरती।
हमारी ज़िंदगी 90% गैर-कुदरती ही चलती है . आत्म-हत्या उस वक़्त गैर-कुदरती हो ही नहीं सकती, अगर मरने वाले के पास ओर कोई राह है ही नहीं थी।
जैसे किसी ने किसी को क्रोध में आ के मार दिया। दोनों का कसूर बराबर का है। अगर दोनों उस पॉइंट पर आ ही गए कि एक को मरना ही पड़ा तो यह ग़ैर-कुदरती नहीं है। जिस को मारा गया, उस व्यक्ति के आगे कितनी बार मौके ऐसे आये होंगे कि वो दूसरे के क्रोध का कारण न बने , पर रुका नहीं। मारने वाले के पास में आखरी पोंइट पर भी एक और मौका था कि वो अपनी राह बदल सकता था पर बदली नहीं तो यह ग़ैर-कुदरती घटना बन गई। आत्म-हत्या करने वाले के पास भी आखरी चॉइस ओर थी, पर वो नहीं रुका तो आत्म-हत्या भी गैर-कुदरती हो गई।
हम सब के पास भी ज़िंदगी को बदलने के बहुत मौके आते हैं, पर हम को तनाव, दर्द, डिप्रेशन में ही रहना है, हमारा जीना ही सब गैर-कुदरती है, तो दुख दर्द आएंगे ही।
कदम कदम पर हम को chance मिलता है कि हम east को जा सकतें हैं या west को। हम ने मंदिर में जाना है या बाजार में। हम ने पानी पीना है सोडा। हम ने मूवी देखनी है या सत्संग सुनना है। क्या हम ने कभी सोचा है कि हमारे जीवन में हम को ख़ुशी क्यों नहीं मिल रही ?
अगर हमारी ज़िंदगी में दुख हैं, तो हम ग़ैर-कुदरती तरीके से जी रहें हैं , अगर हम खुश हैं तो कुदरती तरीके से जी रहें हैं।
जिस्म को मिटाना मौत ही है, पर आत्मा को दर्द में डबो देना गहरी आत्म-हत्या है।
सवाल है :
जब मेरे पास रहने की कोई भी चॉइस नहीं। मेरा जीने को दिल ही नहीं करता, अगर मैं मौत को कबूल करती हूँ तो मैं किस हालत में यह कदम ले रही हूँ ,वो आप तो कभी नहीं समझोगे। जब मैं जी रही हूँ, तब तो आप सब में हिमत नहीं, मेरा को साथ देने की, अगर मैंने मौत को choose कर लिया तो आप अपनी अपनी धार्मिकता को मेरी मौत पर कफ़न की तरह झाड़ोगे ?
हम सब कदम कदम पर गैर-कुदरती ही कारनामे करतें हैं। यह सब बीमारी हमारी गैर-कुदरती जीने का ही फल है।
अगर मेरी रूह ही मर चुकी है तो जिस्म की क्या औकात है ? आप सब के धर्मो के अनुसार जिस्म मिट्टी है। अगर जिस्म मिट्टी ही है तो मिट्टी की कीमत बढ़ जाती है क्या, जब कोई आत्म-हत्या करता है?
धर्म के नाम पर जब गरीब की गरीबी का सौदा हम करतें हैं , तब रूह की कुछ कीमत नहीं। वैसे हमारे लिए रूह परमात्मा का निवास है।
जब वोट के नाम पर अपनी शक्ति दिखातें हैं, और जनता की ज़िंदगी का हम गलत फाइदा लेते हैं, क्या यह क़त्ल नहीं ?
दिल को तोड़ देना, जीने की चाहना को लूट लेना , यह हत्या नहीं ,क्या ?
कदम कदम पर हम सब एक दूसरे को लूटतें हैं , दूसरे को इंसान भी नहीं समझते , तब, क्या हम दिल का क़त्ल नहीं करते, यह गैर-कुदरती नहीं है कि हम ने किसी से जीने की उमंग ही मिटा दी ?
जब किसी ने आत्म हत्या कर ली तो हम कैसे धर्म के और समाज के ठेकेदार बन जातें हैं , हमारे में शर्म है ही नहीं ?
जिस ने आत्म-हत्या की, वो दोषी नहीं, हम दोषी हैं, हम को सज़ा मिलेगी.

जैसे ज़िंदगी ने मेरे को दिखाया है और मेरे समझाया है, उस के अनुसार कहती हूँ कि
- जब भी कोई भी आत्म-हत्या करता है, हम सब का कसूर है , हम सब ने ही उस इंसान को यह कदम लेने केलिए मज़बूर किया है। चाहे हम जानतें हैं या नहीं।
- अगर कहीं पर कोई भी चोर पैदा होता है, उस को हम सब ने ही चोर बनाया है, जाने और अनजाने में।
- अगर कहीं पर कोई ऋषि पैदा होता है, उस की पैदाइश के पीछे भी हम सब हैं, जाने और अनजाने में।
परमात्मा एक है
संसार एक है
हम सब एक हैं
मानोगे तो कुदरती है
नहीं मानोगे तो हम ही गैर-कुदरती हैं
अगर हम सब को एकभाव से नहीं देख सकते तो हम जो भी करेंगे तो वो गैर-कुदरती ही होगा।  तो फिर हम खुश और सुखी जीवन की आस कैसे रख सकतें हैं ?
अभी मेरे दिमाग में एक सवाल आ गया तो इस सवाल को आपने साथ ले जाओ और इस सवाल को खुद ही चुपके से जवाब दे डालो।
मेरे में ख्याल आया कि फिर मौत तो सिर्फ ऋषिओं की ही कुदरती होती है, ओर किसी की तो हो ही नहीं सकती ,फिर ?
जब यह ख्याल दिल में आया तो ऋषिओं की मौत का जो विवरण इतहास से मिलता है तो वो याद आया---तो सवाल ने मन के ऊपर अपना सवालिया-चिन लगा दिया

हंकार को मारने की कोशिश करनी चाहिए, जिस्म को नहीं। 
 ईगो मर गई तो सब से गहरी खुद की हत्या हो गई, 
जो महासुख को जन्म देती है और 
यही है असली आत्महत्या और असली मर जाना। 
खुश रहो

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