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Game of Death ( Corona Virus )

Game of Death   ( Corona Virus )
Following the trail of colorful emotions and beautiful divine relationships. Now life Blossoms, beginning to love because it is a vibrant land of love and a beautiful feelings to wander across the heart during the journey of awakening. But here are some of the most stunning moments to witness life in full bloom with divine relationship and divine action like spring...And now thoughts are in bloom

Have you ever treated the father as a human being?



Today, when the Father got deep into the depth of the word, only one of the people met.
Human: Whenever we see any person in a relationship, we make the existence of that person very small. If we see that person as a human being first, then see him from the layer of relationships, then the existence of a human being is very big. How many relationships a person goes through, why and how?
Today, the moment I looked at the relationship from that word came in me, whom we call the father.
Every person has a profound influence on me. How many humans we meet every day of our lives, some are special and some become common and go through life. What is father? We called the father who gave birth to the body, but this is why we fell in love with him because our mind was also born from him. Our thinking is also being formed by the person with whom we live everyday. Life is concerned not with the creation of body, but with the formation of thought.
My memory has been very deep. When I was 3–4 years old, I always remembered that too. How was the house - who used to come in the house, how was their appearance? When my cousin was born, how did the baby cry and how was the house crying. How was my father's grandmother, when she died, how were the people of the house crying, and how did one of my cousins ​​and I see them crying and copy them all. Which color dress was I wearing? How Dr. used to come and pick me up and take him to his clinic. Meaning that my memory power was also deep and fast.
I remember how my childhood eyes looked at all the people in the house and how I used to see Bapu ji. How was thinking in that look, that is how my mind was being made, I remember that and I have seen how my mind is made up.
 As my eyes were looking at Bapu ji, how did my eyes change to see Bapu ji. Bapu ji is the character of my life, whom I have seen with an empty eye and also with an empty heart. How does emotion arise in my empty existence? How I saw Bapu ji with that feeling, and how it changed my thinking to see how good Bapu ji is?
  I saw the old father and the young father also. Bapu ji's role has been very big in my empty eyes. I remember a lot. And I always asked God why I would never forget anything, I would have given me amnesia too.

I have seen Bapu's life since childhood. Just as Bapu ji was, such a person should never be allowed into the limits of any limited relationship. Such a person should go towards public good. The character of humans like Bapu ji should not be for the four walls of the house, it should be for the public. Meaning that a person should get a chance that he should get the right to live life as he is. Social structure does not allow a person to flowering real. Man comes in seed form and dies in seed form. Only humans like Bapu ji should be master, who keep humanity alive and can become an example.
I see how deep my little eyes had started taking lessons. Just like how these small eyes of ours not only see the big mountain but also look at the distant sky, in the same way, my small eyes have always seen the heart of people, have seen far away.
I have seen Bapu Ji's virtuous state sobbing. I had learned from this state of Bapu ji that I always have to support the hearts of all, never to be a burden on anyone. Just keeping the freedom, today I am following my own learning.
Bapu ji had also created my mind and my first thought was Bapu ji and my first feeling and first lesson was Bapu ji.
So today to all the fathers from me,
Happy Father's Day!
***—***
बाप लफ्ज़ की गहराई में आज जब में गहरे उतर ही गई तो लफ्ज़ में से सिर्फ एक इंसान से ही मुलाकात हुई।  
इंसान: जब भी हम किसी भी इंसान को रिश्ते में से देखतें हैं तो हम उस इंसान के वजूद को बहुत छोटा कर देतें हैं।  अगर उस इंसान को पहले इंसान के रूप में देखतें हैं तो फिर उस को रिश्तों की परत से देखतें हैं तो इंसान का वजूद बहुत बड़ा दिखाई देता है।  एक इंसान कितने रिश्तों की परतों में से गुज़र जाता है, क्यों और कैसे ?

जिस को हम बाप कहतें हैं ,आज उस लफ्ज़ में से उस रिश्ते की ओर  देखने का पल मेरे में आ समाया। 
हर इंसान का मेरे पर प्रभाव बहुत गहरा पड़ता है।  हम रोज़-मरा की ज़िंदगी में से कितने इंसानों से मिलते हैं, कुछ ख़ास और कुछ आम बन कर ज़िंदगी में से गुज़रते रहतें हैं। बाप क्या है ? जिस्म को जन्म देने वाले को हम ने बाप कहा पर उस के साथ प्यार इस लिए पड़ा क्योंकि उस से हमारा मन भी पैदा हुआ। जिस इंसान के साथ हम हर रोज़ जी रहें हैं, उस से हमारी सोच भी बन रही होती है।  ज़िंदगी का संबंध जिस्म के बन जाने से नहीं सोच के बन जाने से होता है |
मेरी याद-शक्ति बहुत  गहरी रही है।  जब मैं ३-४ साल की थी, मेरे को वो भी सदा याद रहा।  घर कैसा था- कौन  घर में आता था, उन की शक्ल कैसी थी ? मेरी  चचेरी-बहन का जब जन्म हुआ था , तब कैसे बच्चे के रोने की आवाज़ आई थी और कैसे घर में रौनक थी।  मेरे बापू जी की नानी कैसी थी, जब उस की मौत हुई थी, घर के लोग कैसे रो रहे थे और मेरी एक चचेरी-बहन और मैं कैसे उन की रोने को देख कर उन सब की नक़ल लगाती थी।  मेरे कौन से रंग की ड्रेस पहनी हुये थी।  कैसे डॉ, आते थे और मेरे को उठा कर अपनी क्लिनिक में ले के जाते थे।  मतलब कि  मेरी याद-शक्ति भी गहरी और तेज़ थी। 
मेरे को याद है कि मेरी बचपन की आंखें कैसे घर के सब लोगों को देखती थी और  मैं कैसे बापू जी को देखती थी।  उस देखनी में कैसे कैसे सोच आ रही थी, मतलब कि मेरा मन कैसे बन रहा था, वो मेरे को याद है और मैंने देखा है कि मेरा मन कैसे बना है ?
 जैसे मेरी आंखें बापू जी को देख रही थी, मेरी आँखों का बापू जी देखना कैसे बदलता गया।  बापू जी मेरी ज़िंदगी के मैं किरदार हैं, जिन को मैंने खाली आँख से भी देखा है और खाली मन से भी देखा है।कैसे मेरे खाली वजूद में भावना पैदा होती है ? कैसे मैंने उस भावना से बापू जी को देखा, और यह मेरा देखना कैसे सोच में बदला था कि बापू जी कितने अच्छे हैं ? 
  बुड्ढे बाप को  और जवान बाप को भी देखा। मेरी खाली आँखों में बापू जी का रोल बहुत बड़ा रहा है।मेरे को बहुत कुछ याद रहा।  और मैंने सदा खुदा से माँगा कि मैं  कभी कुछ भी भूलती क्यों नहीं, मेरे को भी भूलने की बीमारी दे देता।  
बापू जी की ज़िंदगी को मैंने बचपन से ही देखा है।  जैसे बापू जी थे, ऐसे इंसान को कभी भी किसी सीमित रिश्तों की मर्यादा में नहीं जाने देना चाहिए।  ऐसा इंसान लोक-भलाई की ओर  जाना चाहिए। बापू जी का जैसे इंसानों का किरदार घर की चार-दीवारी के लिए नहीं होना चाहिए , जनता के लिए होना चाहिए।  मतलब कि इंसान को मौक्का मिलना चाहिए कि जैसा वो है,  उस को वैसी ही ज़िंदगी जीने का हक़ मिलना चाहिए।  सामाजिक ढांचा व्यक्ति को असलियत में महकने नहीं देता।  इंसान बीज -रूप में ही आता है और बीज-रूप में ही मर जाता है।  बापू जी जैसे इंसान ही मास्टर होने चाहिए, जो इंसानियत को ज़िंदा रखतें हैं और उदाहरण बन सकतें हैं।  
मैंने देखती हूँ कि ,मेरी छोटी सी आँखों ने कितना गहरा सबक लेना शुरू कर दिया था।  जैसे आज भी हमारी यह छोटी सी आंखें कैसे बड़े बड़े पहाड़ को ही नहीं देखती बलिक दूर तीक आसमान को भी देखती है ,वैसे ही मेरी ें छोटी सी आँखों ने सदा लोगों के दिल को देखा है, बहुत दूर तीक  देखा है। 
बापू जी की गुणों भरी अवस्था को मैंने सिसकते देखा है।   बापू जी की इस अवस्था से मुझे सीख मिली थी कि मैंने सदा सब के दिल का साथ देना है, किसी के ऊपर भी कभी भारू नहीं होना।  बस आज़ादी को बरकरार रखते हुए, मैं आज तीक खुद की सीख पर ही चल रहीं हूँ। 
बापू जी ने मेरे मन को भी पैदा किया था और मेरी पहली सोच भी बापू जी थे और मेरी पहली भावना और पहली सीख भी बापू जी ही थे। 
सो आज सब बाप को मेरी ओर से,
Happy  Father's Day !
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