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My Profession is to always find God in Nature

My Profession is to always find God in Nature
What I knew was that the silence blossomed the heart. When the heart blossomed, there was a feeling of love. The romance started with me. When my romantic-mind took all my stress from me all the time, I could not know. I who I am, I am unknown, today I remembered Buddha in unknown happiness

Does disease actually happen? If not, then what is that? ( healthy living)

If the body has a disease then the mind is definitely sick, 
90% of the disease is caused by the mind itself.
Stress is the root of the disease of the mind.
 Our attraction or greed is behind stress.
 When we are under stress, the chemistry of our particles changes. 
The color from which the particles are made, changes in its color and its shape. 
The revenge that happens to our body is like a earthquake - 
which destroys particles. 
When the nature of the particles has changed, then we have to get sick.
I have loved everyone by closing my eyes, 
but never listen to anyone's words with my eyes closed.
 When a thing seemed good,
 then I used to pray to make that good thing my experience.
 When my experience was made, I used to fall in love with universe and not any one. Because every experience of mine would have taught me
 how much beauty is hidden in every living being, 
when it will be revealed, then how unique this creature will be! Wow!
 Just thinking about the future, gets wet with love.
I had only one enemy in life,
 that was sorrow, pain, suffering, stress, worry, say anything. For me it was all one family - with whom I had to end every relationship.
Relationship ends only when we get to know each other well. 
When we came to know each other,
 we got absorbed in each other or say that we have crossed that identity.
I had to face face to face with stress. My stress was on the stage of depression. 
The reason for my stress was my love.
What happens under stress?
Chemical particles of our particles are changed. 
And I noticed the state of physical particles in the meditative state.
If particles alive, then only we are called life.
I see that particles hurts not me
I noticed that I am not under stress, those particles are under stress
I am the only cause for their pain.
My greed, my fascination, my stupidity, my ineptness, hurts all particles. 
Particles will get disease.
This disease caused particles to my mind.
Mind is the reason of my sorrow, then first understand this mind.
(Whom I understood the mind, must read 'What is the mind')
As soon as I got the idea of ​​the mind, 
so did the smell of spring weather in me.
The diseases that doctors in Canada said that this disease will not end,
 that disease left me.
 I started getting fit at body level too.
 Age kept growing, and I got fit. 
Even today my fitness is like the rising sun,
 while the body is going towards the setting sun.
What a strange story, and what an experience it will be, 
and how pleasant it will be!
 Ever think, whenever you get time.
Like I am going to some place which is eternal,
 which never ends, which never dies.
 As if not dying is just going to be space in space.
 Not only free from every disease, 
beyond every disease
(As if beyond every fitness)
What should I do if I want to talk about body today?
Should I say a falling body or a rising body
Because my mold does not mold and 
my growth does not increase, 
it is something else - 
with which my mood is becoming very romantic and fit
I have known that we have got body to live, not disease. 
The mind is our biggest enemy, 
by making the friend a friend, 
we can make life healthy and happy 
that we can celebrate life.

***—***

अगर जिस्म को रोग है तो ज़रूर मन रोगी है, ९०% रोग जिस्म को मन के कारण ही लगतें हैं। 
मन के रोग की जड़ तनाव है। तनाव के पीछे फिर हमारा मोह या लालच ही है। 
 जब हम तनाव में होतें हैं तो हमारे कणों की केमिस्ट्री बदल जाती है। जिस तत्त  से कण बने हुए होतें हैं, उस के रंग में और उस के आकार में तबदीली आ जाती है। यह जो बदलाहट होती है, हमारे जिस्म के लिए एक भूचाल की तरह ही होती है -जो कणों को नष्ट करती है।  जब कणों का कुदरत पहरावा ही बदल गया तो हमने  बीमार होना ही है। 
मैंने आँखें बंद कर के सिर्फ सब को प्यार किया है, पर किसी की कही बात को कभी आंख बंद करके माना नहीं।  जब कोई बात अच्छी लगती थी तो उस अच्छी बात को अपना अनुभव बनाने की दुआ मांगती थी। जब मेरा अनुभव बन जाता था तो मेरे को किसी एक से नहीं ब्रह्मण्ड से ही  प्यार  होने लगता था।  क्योंकि मेरा हर अनुभव मेरे को यह सीख दे जाता कि हर जीव में कितनी कितनी सुंदरता छुपी हुई है ,जब यह प्रगट होगी, तब यह जीव कितना अनूठा होगा ! वाओ! बस भविष्य को सोच कर ही प्यार से भीग जाती। 
मेरा एक ही दुश्मन था ज़िंदगी में ,वो था दुःख, दर्द, संताप, तनाव, फ़िक्र, कुछ भी कहो।  मेरे लिए यह सब एक ही खानदान था - जिस के साथ मैंने अपना हर रिश्ता ख़त्म करना था। 
रिश्ता तब ही ख़त्म होता है जब हम एक दूसरे को अच्छी तरह जान लेते हैं।  जब हम एक दूसरे को जान गए तो एक दूसरे में लीन हो गए या कहो कि उस पहचान से पार हो गए। 
ऐसे ही मैंने तनाव के साथ  face to face होना था।  मेरा तनाव  dipression की स्टेज पर था।  मेरे तनाव का कारण मेरा प्यार ही था।  
तनाव में होता क्या है ? 
हमारे कणों के रसायनिक-तत्त बदल जातें हैं। और मैंने ध्यान की अवस्था में  आपने जिस्मी कणों की स्थिति देखी। 
कण जीतें हैं, तो ही तो हम जीवत कहलाते हैं। 
मैंने देखा कि मेरे को नहीं , कणों को दर्द होता है  
मैंने देखा कि मैं तनाव में नहीं, वो कण तनाव में हैं 
मैं सिर्फ उन के दर्द का कारण हूँ। 
मेरा लालच, मेरा मोह, मेरी बेवकूफी , मेरी बेअक्ली, सब कणों को दर्द देती है। कणों को रोग लगेगा ही। 
यह रोग कणों को मेरे मन के कारण लगा। 
मन मेरे दुःख क कारण है, तो पहले इस मन को ही समझ लेते हैं। 
( किसे मैंने मन को समझा , ज़रूर पढ़ना ' मन क्या है  ' )
जैसे जैसे मेरे को मन की समझ आती गई वैसे ही spring  मौसम की खसबू मेरे में समाती गई। 
जिन रोगों को कनाड़ा में डॉक्टर्स ने कहा था कि यह रोग ख़त्म नहीं होगा , वो रोग मेरे को छोड़ कर चला गया।  मैं जिस्मी लेवल पर भी तंदरुस्त होने लगी।  उम्र बढ़ती गई,और मैं तंदरुस्त होती गई।  आज भी मेरी तंरुस्ती चढ़ते सूर्य की तरह है, जब कि जिस्म अस्त होते  सूर्य की तरफ़ जा रहा है। 
कितनी अजीब कहानी है , और यह कैसा अनुभव होगा , और इस का कैसा सुवाद होगा ! कभी सोचना ,जब भी आप को वक़्त मिला। 
जैसे मैं किसी ऐसी जगह की तरफ जा रही हूँ, जो शास्वत है , जिस का कभी अंत नहीं, जो कभी मरती नहीं। जैसे मरना नहीं बस स्पेस में स्पेस ही होने जा रहा है। 
 हर रोग से ही मुक्त नहीं, हर आरोग से भी पार  
(जैसे हर तंदरुस्ती से भी पार )
अगर मैंने आज जिस्म की बात करनी है तो क्या करूँ ?
ढलता जिस्म कहूँ या  बढ़ता जिस्म कहूँ 
क्योंकि मेरा ढलना ढालना नहीं और मेरा बढ़ना बढ़ना नहीं, यह तो कुछ ओर ही है- जिस के साथ मेरा मूड बहुत ही रोमांटिक और तंदरुस्त होता जा रहा है 
मैंने यही जाना कि हम को जिस्म मिला है जीने के लिए, बीमारी  के लिए नहीं।  मन हमारा बहुत बड़ा दुश्मन  है, मन को  दोस्त बना के हम तंदरुस्त और खुशहाल बना के हम ज़िंदगी को जश्न बना सकतें हैं 
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