BREAKING NEWS
latest

What did I know that when I fell in love with myself, my romance with the universe would begin!

What did I know that when I fell in love with myself, my romance with the universe would begin!
When nature became a school, the subject became silent. When I started writing every experience in space, literature began to be created. The creation of literature itself began to understand every article of itself, so understanding itself began to adopt every understanding. This romantic journey of my experiences taught me to love myself. The deepest and most beautiful experience is that when we fall in love with ourselves, then the romance starts with universe, then the universe itself identifies us with every mystery.

What is beyond time? / वक़्त के पार क्या है ?

Definition of time: Time is born, not the person. 
Time has given birth to itself in the shape of a person. 
Time is a shadow of 'Is-ness'


What is beyond time?  



 What is the time? We recognize the time when we cross the time. Before that, we have only talked about time, but time has never lived nor time has ever known.
What is the time?
Is there really anything called time?
What is the relationship of time with life?
 My first encounter with time was in the black cave of deep silence.
When I was asked by some of my deepest consciousness that
'Jinder, have you spent your time till date or your body?'
I do not know how I said but I replied that -
' body '
After that experience, how did I get out of black deep cave and I had a strange power. Like I come back from somewhere very brave.
Then came the voice of another question-
'Jinder, now see where death is?'
Then I said that -
 'Death: death is behind me'
 I answered, but why did I say now that death is behind me. I do not know anything about this either.
What happened in this black deep cave, due to which strange kind of strength and health came in me? Now I had to know that incident.
What was this black cave?
My real reality, my real existence
 How did I get there?

 I do not know, but I was very sad, I had neither the desire to live nor the need to die. I was drifting in a strange and unconscious sense in the last 6 weeks. I only knew that I have no idea for the world and life. I am an unknown and the sadness I had, that sadness was not negative, I was not aware of what was there. I was just somewhere.
 I had a full feeling that I was not moving, this land is moving. And I saw that my feet are not getting up, the ground only pushes me forward. I can't even breathe and I am watching everything.
 I saw that I lay on the bed. When I opened my eyes, I thought that it was evening and I was lying in bed after my morning walk. I was lying all day. When looking at the clock, only 4-5 minutes were spent.
 In these 4-5 minutes I saw myself going beyond death. Death, which stood far away from me. Who was looking at me. What is death?
 A dimension where life, time and world do not exist.
What is there then?
Only our existence exists there. No shape, no form, no color. Like there is thinking, like there is emotion. This our thinking or feeling comes and goes. But there this feeling remains eternal.
I fully realize my existence; But I have no shape. When I saw this, I got a very good answer to one of my questions that when we are on a worldly journey, it is just a shadow of ours, and we are living in the shadow and we are the only one Suppose, how?
how ?

Because, we are far away from the real form of ourselves and we are looking at ourselves from the mind. Our mind, which is our mind in this world, among which we all see, this mind is the shadow of our soul. If we look through the shadow, we will see the shadow itself. Or we can say that when the soul is in the mist, what we see a little about it, that is the mind. Meaning that our spiritual state, when it is in the mist, which gives its light to us, we call that light as our mind.
Until this mist of ours is removed, we, we will not see clearly. When we cannot see ourselves clearly, how can we see anyone clearly?
This mist has to move. This shaking creates the curiosity in us to move forward. When the path of progress is born in us, then we name this region, 'Time'
We start thinking that we have to move forward in the world. We only see our own growing steps in the mind. When we hear this sound from deep, we will automatically see ourselves going from that mist towards our soul.
I saw that even though my steps are on the ground, but I travel in space, because my focus was in the soul and not in the mind.
The spiritual dimension is the dimension of deep silence, from where we can see everything being formed and can see falling, meaning that birth and death can see what is birth and what is death?
When this time came back into the mental dimension, a desire was born again.
'I who I am, how can it travel all these dimensions together? If there is a question, the answer will also be there and I am waiting for that moment in every particle of mine.


***---***

वक़्त की परिभाषा: वक़्त का जन्म होता है, 
व्यक्ति का नहीं। वक़्त ने खुद को व्यक्ति के आकार में जन्म दिया है।
वक़्त, 'हैं-पन' की परछाईं है।  

 वक़्त के पार क्या है ?


वक़्त क्या है ? वक़्त की पहचान हम को उस वक़्त ही आती है, जब हम वक़्त को पार करतें हैं।  उस से पहले तो हम ने वक़्त की सिर्फ बात की है, पर वक़्त को कभी जीया नहीं और ना ही वक़्त को कभी जाना है। 
वक़्त है क्या ?
क्या सच में ही वक़्त नाम की कोई चीज़ है ?
वक़्त का जीवन के साथ नाता क्या है ?
 मेरी पहली बार वक़्त के साथ सहमना, गहरी चुप की काली गुफा में ही हुआ था। 
जब मेरे को मेरी ही किसी गहरी चेतना ने पुछा था कि 
'जिन्दर, आज तक तेरा वक़्त बीता या तेरा जिस्म बीता ?'
मैंने कैसे कहा, यह मैं नहीं जानती पर मैंने जवाब दिया कि -
' जिस्म '
मेरे उस अनुभव के बाद, कैसे मैं काली गहरी गुफा में से बाहर निकली थी और मेरे में अजीबो-गरीब सी ताकत थी।  जैसे मैं कहीं से बहुत बहादर हो के वापस आइए हूँ। 
फिर दूसरे सवाल की आवाज़ आई-
' जिन्दर, अब देख कि मौत कहाँ पर है?'
फिर मैंने कहा कि -
 'मौत: मौत मेरे पीछे है ' 
 मैंने जवाब तो दे दिया, पर मैंने अब क्यों कहा कि मौत मेरे पीछे है। इस के बारे में भी मेरे को कुछ भी पता नहीं। 
इस काली गहरी गुफा में ऐसी क्या  घटना घटी थी, जिस के कारण मेरे में अजीब किस्म की ताकत और तंदरुस्ती आइए हुई थी ? अब मैंने उस घटना को जानना था।  
यह काली गुफा क्या थी ?
मेरी ही असली असलियत , मेरा असली वजूद 
 मैं वहां पर पहुंची कैसे?
 

पता नहीं, पर मैं बहुत उदास थी, मेरे में ना ही जीने की तम्मना थी और ना ही मरने की आरज़ू  थी।  मैं एक अजीब से  और अनजाने  से भाव में पिछले 6 हफ़्तों में बह रही थी।  मैं सिर्फ यह जानती थी कि मेरे में संसार और ज़िंदगी के लिए कोई भी सोच नहीं है।  मैं एक अनजान  हूँ और मेरे में जो उदासी थी, वो उदासी नेगेटिव नहीं थी कुछ ओर ही थी  क्या थी, मेरे को नहीं पता था।  बस मैं कहीं पर थी।  
 मेरे को पूरा अहसास था कि मैं  नहीं चल रही, यह तो  ज़मीन चल रही है। ओर  मैंने देखा कि  मेरे पैर  नहीं उठ रहे, ज़मीन ही मेरे को आगे को धकेलती है। सांसें भी मुझ को नहीं आ रही और मैं तो हर चीज़ को देख रही हूँ। 
 मैंने देख कि मैं bed  पर लेट गई।  जब आँख खुली तो मैंने सोच कि  शाम हो गई  और मैं सुबह की सैर के बाद आ कर bed पर पड़ी थी।   मैं सब दिन पड़ी ही रही।  जब घड़ी की ओर देखा तो  सिर्फ ४-५ मिनट्स ही बीते थे। 
 इन 4 -5  मिनट्स में मैंने खुद को मौत के पार देखा था।   मौत , जो मेरे से बहुत दूर  खड़ी थी।  जो मेरे को देख रही थी। 
मौत क्या है ?
 एक वो आयाम , जहाँ पर  ज़िंदगी, वक़्त  और संसार नहीं होता। 
फिर वहां पर क्या है?
सिर्फ हमारा होना ही वहां पर मजूद है।  कोई आकार नहीं, कोई रूप नहीं, कोई रंग नहीं।  जैसे सोच होती है, जैसे भावना होती है।  यह हमारी सोच या भावना आती है और चली जाती है।  पर वहां पर यह एहसास शास्वत ही रहता है। 
मेरे को  मेरी मजूदगी का पूरा एहसास है ; पर मेरा कोई भी आकार नहीं है।  जब मैंने यह देखा तो मेरे को मेरे एक सवाल का बहुत अच्छा जवाब मिल गया कि जब हम संसारी -यात्रा में होतें हैं तो वो एक सिर्फ हमारी एक परछाईं होती है,  और हम परछाईं में ही जी रहे होतें हैं और उस को ही हम सच मान रहे होते हैं , कैसे ?
कैसे ?

क्योंकि, हम खुद के वास्तविक रूप से बहुत दूर है और हम मन से खुद को देख रहे हैं। इस संसारीआयाम में जो हमारा मन है, जिस के बीच में से हम सब देखतें हैं, यह मन हामरी ही आत्मा की परछाईं है।  अगर हम परछाईं के बीच में से देखेंगे तो परछाईं को ही देखेंगे।  या हम ऐसा कह सकतें हैं कि आत्मा जब धुंध में होती है, जो उस की हम को थोड़ी सी शक्ल दिखाई देती है, वो है मन।  मतलब कि हमारी आत्मिक स्थिति, जब धुन्ध  में होती है, जो उस की थोड़ी ही रौशनी हम तक पहुंचती है, उस रौशनी को ही हम हमारा मन कहते हैं।
जब तक हमारी यह धुंध दूर नहीं होती, हम को, हम ही साफ़ दिखाई नहीं देंगे।  जब हम खुद को ही साफ़ साफ़ देख नहीं सकते, तो हम किसी को भी साफ़ कैसे देख सकतें हैं ?
यह धुंध ने हिलना ही है।  यह हिलना ही हमारे में  हमारे आगे बढ़ने की जिज्ञासा को पैदा करता है।  जब हमारे में आगे बढ़ने की रीझ जन्म लेती है तो हम इस रीझ को नाम देतें हैं, 'वक़्त'
हम सोचना शुरू कर देतें हैं कि हम ने संसार में आगे बढ़ना है।  हम सिर्फ खुद के बढ़ते कदम को मन के राहीं ही देखते हैं। जब हम इस आहट को गहरे में से सुनेंगे  तो हम खुद-ब-खुद ही उस धुंध में से खुद की आत्मा की तरफ जाते हुए ही दिखाई देंगे। 
मैंने देखा कि चाहे मेरे कदम ज़मीन पर चलते हैं, पर मैं यात्रा स्पेस की करती हूँ , 
क्योंकि मेरा ध्यान आत्मा में था, मन में नहीं।
आत्मिक आयाम  गहरी चुप का आयाम है, जहां से हम सब कुछ बनता देख सकतें हैं और गिरता देख सकतें हैं, मतलब कि जन्म और मौत को देख सकते हैं कि जन्म क्या है और मौत क्या है ?
इस वक़्त के पार के आयाम में से जब वापस मानसिक आयाम में आई तो एक रीझ ने फिर से जन्म लिया कि-
' मैं जो मैं है, यह कैसे इन सब आयाम की यात्रा एक  साथ कर सकती है ? अगर सवाल है तो जवाब भी होगा और उस पल का इंतज़ार मेरे हर कण में हैं।'      
« PREV
NEXT »

No comments

The way of speech

The way of speech
This is what I learned and understood from life and also learned that every human being needs one thing very much, that is education. Education is not that one should have a degree, education should be one with which a person can understand life. What does it mean to know? What is understanding? What is recognized? And what to believe? When we understand these four questions, then the art of living comes in us. This art is such that life gets embodied in the veneer of health. Because we start seeing life so deeply that diseases are far away and we live life at the highest level. I will share these four questions with all of you from different direction and from different condition.

Thanks you came here

Thanks you came here
The best cure of the body is a quite mind:. Powered by Blogger.